हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

राजद्रोह का राष्ट्र: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 9/08/2016 03:17:00 PM


आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे आलोचना और असहमति को कुचलने के लिए तथा बोलने की आजादी को खत्म करने के लिए राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है. अनुवाद:रेयाज उल हक
धारा 124 ए... भारतीय दंड विधान की राजनीतिक धाराओं का शायद सरताज है, जिसे नागरिकों की आजादी को कुचलने के लिए बनाया गया है.
-महात्मा गांधी

राजद्रोह (जिसे गलत तरीके से और शायद जानबूझ कर देशद्रोह कहा जा रहा है) फिर से सुर्खियों में है. इस बार इसका आरोप एक समूचे संगठन पर लगा है. दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले एक अग्रणी एनजीओ की शाखा एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने 13 अगस्त को ‘ब्रोकेन फेमिलीज़’ नाम का एक सेमिनार आयोजित किया था. यह जम्मू और कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन का इंसाफ मांगने के अभियान का हिस्सा था. कार्यक्रम के दौरान जब पीड़ित अपनी आपबीती सुना रहे थे तो दक्षिणपंथी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों ने विरोध करना शुरू किया. इसके बाद हुई कहासुनी में कुछ कश्मीरी छात्रों ने आजादी के पक्ष में नारे लगाए. एबीवीपी ने एक एफआईआर दर्ज कराया और बैंगलोर पुलिस को इसके लिए मजबूर किया कि वो एमनेस्टी इंडिया पर ‘दुश्मनी को बढ़ावा देने’ के आरोप में और धारा 124-ए के तहत मुकदमा दर्ज करे जिसमें अगर कसूर साबित हो गया तो आजीवन कैद की सजा हो सकती है. राज्य की कांग्रेस सरकार ने फजीहत से बचते हुए कहा कि वो जांच के बाद ही इस दिशा में कोई फैसला करेगी. इस बेमतलब के बयान के बावजूद, अगर नारे भारत-विरोधी और पाकिस्तान के पक्ष में थे, तब भी सरकार को यह पता होना चाहिए कि कानूनन यह राजद्रोह के दायरे में नहीं आता.

मौजूदा सत्ताधारी गिरोह द्वारा इस पुराने पड़ चुके कानून का जिस तरह गलत इस्तेमाल किया जा रहा है वो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की पूरी तरह अवमानना है. इसका मतलब हरेक असहमति को राजद्रोह बना देना है. इस गिरोह ने सरकार, राज्य, राष्ट्र और देश के बीच के फर्क को मिटा दिया है और वो खुद को राष्ट्रवाद और देशभक्ति का साकार रूप मानने लगा है, इसलिए जो कोई भी इसके सामने खड़ा होता है वो खुद ब खुद राजद्रोही बन जाता है. पिछले चुनावों में 69 फीसदी भारतीयों ने उनके पक्ष में वोट नहीं डाला था और उनके प्रति कुछ असहमति जाहिर की थी, और इस दलील के मुताबिक वे संभावित रूप से राजद्रोही हैं, और इस तरह यह दलील इस देश को राजद्रोही लोगों का एक राष्ट्र बना देती है.

औपनिवेशिक विरासत

 
धारा 124-ए का मसौदा मूल रूप से मैकाले के 1837-39 के ड्राफ्ट पीनल कोड (मसौदा दंड संहिता) में बनाया गया था, लेकिन 1860 में लागू हुई आईपीसी में से इसे हटा दिया गया था. इसको 1870 में भारतीय मीडिया, बुद्धिजीवियों और आजादी की लड़ाई लड़ने वालों की असहमत आवाजों को दबाने के लिए लागू किया गया. इसके सबसे शुरुआती मुकदमों में से एक 1891 में  बंगोबासी के संपादक जोगेंद्र चंद्र बोस का मुकदमा था, जो एज ऑफ कॉन्सेंट बिल की आलोचना करने और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के नकारात्मक आर्थिक प्रभावों पर टिप्पणी करने के लिए उन पर चला था. इसके बाद अनेक मुकदमे चले, सजाएं हुईं. लोकमान्य तिलक को इस अधिनियम के तहत 1897 में कसूरवार ठहराया गया लेकिन उन्हें 1898 में मैक्स वेबर जैसी अंतरराष्ट्रीय रूप से मशहूर शख्सियत के दखल के साथ इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे, न लिखेंगे और न बोलेंगे जिससे सरकार के प्रति नाखुशी को बढ़ावा मिलता हो. यह कानून ‘नाखुशी’ (disaffection) की अजीबोगरीब बात की ओट में सरकार के प्रति वफादारी की मांग करती है, जिसको तिलक के खिलाफ मुकदमे के दौरान परिभाषित करते हुए जज ने बताया था कि नाखुशी का मतलब मतलब सरकार के प्रति ‘प्यार की कमी’ है. आगे चल कर इसका शिकार बने गांधी ने इसकी साफ-साफ आलोचना करते हुए कहा था, ‘कानून के जरिए आप प्यार नहीं जगा सकते और न इसको अपनी मर्जी से चला सकते हैं. अगर किसी को किसी इंसान से प्यार नहीं है, तो उसे अपनी नाखुशी को जाहिर करने की इसकी पूरी आजादी होनी चाहिए, बशर्ते वो हिंसक तरीके नहीं अपनाता और इसके लिए लोगों को प्रोत्साहित करने और भड़काने नहीं लग जाता.’ आगे चल कर गांधी राष्ट्रपिता बने और भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना, लेकिन यह कठोर औपनिवेशिक कानून, बल्कि पूरा का पूरा आईपीसी ही अच्छे लगने वाले जुमलों और बातों के संवैधानिक मुलम्मे के साथ जस का तस अपना लिया गया.

संविधान सभा में राजद्रोह को हटाने के लिए एक संशोधन पेश किया गया था, लेकिन के.एम. मुंशी की दखल ने इसे बचा लिया, जिनकी दलील थी कि सरकार की आलोचना और सुरक्षा और व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले उकसावे के बीच में फर्क किया जा सकता है. पहले संविधान संशोधन के वक्त प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने साफ साफ कहा था कि राजद्रोह कानून बुनियादी तौर पर असंवैधानिक है. इसके बावजूद राजद्रोह कानून कानून की किताब में बना रहा और केंद्र और राज्य सरकारें बार-बार इसका इस्तेमाल राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए करती रहीं. इस कानून को पहली बड़ी संवैधानिक चुनौती पचास के दशक में मिली जब तारा सिंह गोपी चंद (1951), साबिर रजा (1955) और राम नंदन (1958) के तीन मामलों में इसे बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन करने के कारण रद्द कर दिया गया. पहले मामले में मुख्य न्यायाधीश एरिक वेस्टन ने लिखा, “भारत अब एक सार्वभौम लोकतांत्रिक राज्य है. ...विदेशी शासन के वक्त जरूरी माना गया राजद्रोह का कानून अब इस बदलाव की वजह से ही नामुनासिब हो गया है.” बाद में राम नंदन के मामले में, जिनको खेतिहरों और मजदूरों को अपनी सेना बना कर सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए प्रोत्साहित करने के भड़काऊ भाषण का कसूरवार ठहराया गया था, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में धारा 124-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई. अदालत ने राम नंदन को कसूरवार माने जाने को खारिज कर दिया और धारा 124-ए को असंवैधानिक घोषित किया.

कानून की वापसी
 

लेकिन 1962 में सर्वोच्च न्यायालय ने केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में इस फैसले को पलट दिया. केदार नाथ सिंह बिहार में फॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के एक सदस्य थे, उन्होंने कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और तानाशाही का आरोप लगाया था और जमीन के फिर से बंटवारे की विनोबा भावे की कोशिशों को निशाना बनाया था. उन्होंने क्रांति की बात की थी, जो पूंजीपतियों, जमींदारों और कांग्रेस नेताओं को उखाड़ फेंकेगी. ट्रायल कोर्ट ने उन्हें आईपीसी की 124-ए और 505-बी के तहत कसूरवार ठहराया. उन्होंने इस फैसले के तहत अपील किया. पटना उच्च न्यायालय ने उनकी अपील को खारिज कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को तो कायम रखा, लेकिन इसे सिर्फ उन्हीं कार्रवाइयों में लागू किए जाने लायक बताया जिनमें कानून-व्यवस्था भंग किए जाने का रुझान मिलता है  या फिर जिनमें फौरन हिंसा भड़काई गई हो. जजों ने साफ-साफ यह कहा कि अगर राजद्रोह कानून की व्याख्या व्यापक हुई तो यह संवैधानिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा. इसलिए अदालत ने अमेरिकी कानून की तर्ज पर राजद्रोह के मामलों को तय करने के लिए इस बात पर जोर दिया कि उस कार्रवाई का असर क्या था, न कि अपने आप में वह कार्रवाई क्या थी. इसने बहुत साफ-साफ कहा कि अगर ‘लिखे या बोले गए शब्द, जिनसे सरकार के खिलाफ सिर्फ नाराजगी या दुश्मनी पैदा होती हो’ के मामले में धारा 124-ए को लागू किया गया तो ऐसे में यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के अधीन होगी. यह अनुच्छेद अन्य बातों के अलावा सभी नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति के, शांति पूर्ण रूप से जमा होने और संगठित होने के अधिकार देता है.

कोई कार्रवाई सचमुच राजद्रोह है, या फिर इसके नाम पर किसी तरह से बोलने की आजादी को कुचलने की कोशिश हो रही है, इसकी पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने ‘फौरन हिंसा’ भड़काने की जो कसौटी रखी है, उस पर वो अपने फैसलों में बार-बार जोर देता रहा है जैसा कि एस. रंगराजन वगैरह बनाम पी. जगजीवन राम; इंद्र दास बनाम असम राज्य, और अरुप भुइंयां बनाम बनाम असम राज्य मामलों में देखा जा सकता है. इस संदर्भ में सबसे अहम फैसलों में से एक बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य है, जिसमें दो सिखों पर इंदिरा गांधी की हत्या के दिन खालिस्तान के पक्ष में और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप लगाया गया था. नारे साफ तौर पर भारतीय सार्वभौमिकता और सरकार को कमजोर करते हैं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपितों को बरी कर दिया क्योंकि उन्होंने फौरी तौर पर कोई हिंसा नहीं भड़काई थी. सर्वोच्च न्यायालय ने इसे साफ किया कि देश से अलग होने या हिंसक तरीके से सरकारों को उखाड़ फेंकने की हिमायत करना भी राजद्रोह के दायरे में नहीं आता, जब तक कि यह फौरी तौर पर हिंसा को उकसावा न देता हो.

कानून का राज कहां है

कानून भले ही ऐसा हो, लेकिन सरकारें इसे राजनीतिक असहमति को कुचलने या फिर लोगों को काबू में करने की खातिर उन्हें आतंकित करने के लिए इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करती रही हैं. बदकिस्मती ये है कि अरुंधति रॉय, एसएआर गीलानी, डॉ. बिनायक सेन और हाल ही में जेएनयू के छात्रों, तमिल लोक गायक कोवन, हार्दिक पटेल और असीम त्रिवेदी जैसे कुछ मशहूर मामले ही मीडिया में जगह बना पाते हैं. दिलचस्प बात ये है कि गीलानी और रॉय के मामले में राजद्रोह के मुकदमे पुलिस द्वारा नहीं बल्कि निचली अदालत द्वारा थोपे गए. कुछ कम जाने माने मामलों में शामिल है एक कश्मीरी स्कूली शिक्षक का मामला जिसको कश्मीर घाटी में अशांति से संबंधित सवाल वाला एक प्रश्न पत्र तैयार करने के लिए राजद्रोही बताया गया, दलित सामाजिक कार्यकर्ता और विद्रोही के संपादक सुधीर धवले को माओवादी संपर्कों के लिए गिरफ्तार किया गया, अहमदाबाद में द टाइम्स ऑफ इंडिया के स्थानीय संपादक भारत देसाई को अपने एक वरिष्ठ रिपोर्टर और फोटोग्राफर के साथ इस आरोप का सामना करना पड़ा, जिन्होंने पुलिस अधिकारियों की काबिलियत पर सवाल उठाए थे और उनके और माफिया के बीच रिश्तों का आरोप लगाया था; एक भारत-पाक क्रिकेट मैच के दौरान पाकिस्तान के लिए खुशी मनाने वाले कश्मीरी छात्रों पर इसका आरोप लगाया गया. लेकिन गरीब आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों के ऐसे बेशुमार मामले हैं, जिन पर किसी की भी निगाह नहीं जाती.

एक तरफ जहां अवाम के हक में खड़े कार्यकर्ता और बुद्धिजीवियों को राजद्रोह के आरोपों में परेशान किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ असली अपराधियों को महान देशभक्त बताया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजद्रोह की जो परिभाषा दी गई है, उसकी सबसे अच्छी मिसाल 1992-93 में बंबई दंगों के पहले और उसके दौरान बाल ठाकरे के भाषण हैं, जिन्होंने श्रीकृष्णा आयोग के मुताबिक मुसलमानों की हत्याओं के लिए सीधे-सीधे उकसाया. उसके पहले भाजपा नेताओं द्वारा रथ यात्रा के दौरान और अयोध्या में 1992 में दिए गए भाषण हैं, जिनका अंजाम ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद की तबाही और खौफनाक सांप्रदायिक दंगे रहे. ये राजद्रोह के सटीक मामले हैं. खुद नरेंद्र मोदी द्वारा 2002 में दिए गए सांकेतिक बयान भी राजद्रोह की मिसाल हो सकते हैं, जो गुजरात में 2000 मुसलमानों के कत्लेआम की वजह बने. और बेशक साधुओं और साध्वियों और प्रवीण तोगड़िया और प्रमोद मुतलिक जैसों द्वारा लगातार जहर उगलना तो पक्के तौर पर राजद्रोह है, जो सीधे-सीधे मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़काते हैं.

राजद्रोह के मामलों के इतिहास को देखें तो उनमें से शायद ही कोई अदालत में टिक पाता है, लेकिन पुलिस बेधड़क इसका इस्तेमाल करती जा रही है, जैसा कि एमनेस्टी के मौजूदा मामले में देखा गया है. इस मामले में विडंबना ये है कि सेमिनार में एबीवीपी की हरकत को राजद्रोही कहा जा सकता है, क्योंकि इसने सीधे-सीधे एक भीड़ को एमनेस्टी के दफ्तर पर हमला करने के लिए उकसाया और सार्वजनिक व्यवस्था को भंग किया, जबकि कश्मीरी छात्रों द्वारा लगाए गए आजादी के नारों से कुछ भी नहीं हुआ था. अनुभव के आधार पर साबित तथ्य यह है कि सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा तभी होता है जब एक प्रभावशाली इंसान, जो हरेक मामले में एक ऐसा राजनेता होता है जिसे राज्य का समर्थन हासिल होता है, कोई विवादास्पद बयान देता है. कार्यकर्ता भले ही लोगों को विद्रोह में उठ खड़े होने को उकसाएं, उन्हें जनता की तरफ से ऐसी कोई प्रतिक्रिया मुश्किल से ही मिलती है.

लेकिन फिर यह अधिनियम कानून का हिस्सा अभी तक क्यों बना हुआ है, जो लोकतंत्र के इतने अयोग्य है? हमारे भलेमानस जजों ने इसकी व्याख्या की है, लेकिन जिस भाषा में यह व्याख्या की गई है वह अभी भी पुलिस को इसके लिए एक पर्याप्त ओट देती है कि वह लोगों को परेशान करती रहे. और शासकों का मकसद ही यही है. संविधान की संरक्षक अदालतों को इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर देना चाहिए, क्योंकि यह संविधान की आत्मा को पूरी तरह से नकारता है. अगर जनता सार्वभौम है और उसने ही सरकार बनाई है, तो फिर जनता को ही कैसे राजद्रोही कहा जा सकता है? जिन चुने हुए प्रतिनिधियों पर भरोसा करते हुए जनता ने उन्हें सत्ता सौंपी है, अगर वो गलत आचरण करते हैं और इस भरोसे का उल्लंघन करते हुए अपनी सत्ता का गलत इस्तेमाल करते हैं, तो असल में राजद्रोह तो इसे होना चाहिए.

वक्त आ गया है कि हमारा सर्वोच्च न्यायालय इस कानून को और ऐसे ही दूसरे कठोर कानूनों को खत्म करे और हमें इस मजाक से राहत दिलाए.

गुजरात आंदोलन के नेता जिग्नेश मेवाणी से एक बातचीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/14/2016 04:17:00 PM


गुजरात में चल रहे मौजूदा दलित आंदोलन को जिग्नेश मेवाणी ने एक शक्ल और एक दिशा दी है. भले ही वे इसके अकेले नेता नहीं हैं, लेकिन वे इस आंदोलन का चेहरा और दिमाग दोनों हैं. मौजूदा आंदोलन की रीढ़ उना दलित अत्याचार लड़त समिति उन्हीं की पहल पर बनी और वे इसके संयोजक हैं. 35 वर्षीय जिग्नेश एक वकील, आरटीआई कार्यकर्ता और दलित अधिकार कार्यकर्ता रहे हैं. राज्य में वे दलितों के जमीन पर अधिकार के मुद्दों पर अथक लड़ाई लड़ने वाले एक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं.
 

स्वतंत्र पत्रकार सुरभि वाया ने जिग्नेश मेवाणी से यह बातचीत 4 अगस्त को की थी और अंग्रेजी में यह कारवां पत्रिका में प्रकाशित हुआ. हालांकि यह बातचीत मूलत: हिंदी में ही हुई थी, लेकिन यहां पोस्ट करने के लिए हमें इसके अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी अनुवाद करना पड़ा है. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

अब तक हाशिया की पोस्टों का, खास कर आनंद तेलतुंबड़े के लेखों का, हिंदी से गुजराती में अनुवाद करते आए जिग्नेश मेवाणी के इस साक्षात्कार को हाशिया पर पोस्ट करते हुए हमें खुशी हो रही है .
 
 

सुरभि वाया: उना की घटना में आपकी समझ से ऐसा क्या था जिसने इस विद्रोह की शुरुआत की? क्यों यह एक चिन्गारी बन गया?

जिग्नेश मेवाणी: जिस तरह उना की घटना का वीडियो वायरल हुआ, इसे व्हाट्सएप पर भेजा जा रहा था, जिसमें दिन दहाड़े सब देख सकते थे कि उना कस्बे में आप चार दलित नौजवानों को पीट रहे हैं, एक तरह से उनकी खाल उधेड़ रहे हैं...

इसके बाद पूरे दलित समाज का आत्म सम्मान और इज्जत भी छीन लिया गया. आपने एक इंसान और एक समुदाय के आत्म सम्मान को दिन दहाड़े सबकी आंखों के सामने कुचल कर रख दिया. जिस तरह इसे मीडिया ने उठाया और एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया, उसने भी आंदोलन को मजबूती दी. लेकिन यह तो होना ही था.

सुरभि वाया: अब मोदी केंद्र में हैं, क्या इस वजह से गुजरात के हिंदू गिरोहों का चरित्र बदला है?
 

जिग्नेश मेवाणी: एक बड़ी सावधानी से सोची-समझी रणनीति के तहत संघ परिवार और भाजपा ने पूरे देश में दलितों के भगवाकरण की परियोजना शुरू की थी. उन्होंने गुजरात में भी इसको आजमाया. लेकिन मुख्यत: जन विरोधी, गरीब विरोधी गुजरात मॉडल में दलितों के लिए अपनी हार और अपने शोषण के अलावा और कुछ नहीं रखा था. एक ऐसा दौर था जब वे हिंदुत्व की विचारधारा के साथ चले गए थे, लेकिन वह दौर अब खत्म हो रहा है और वे अब इसको पहचान सकते हैं कि ये लोग असल में कैसे हैं. जब आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है और दूसरी तरफ वे “वाइब्रेंट” और “गोल्डेन गुजरात” जैसी बड़ी बड़ी बातों का जाप सुन रहे हैं. “सबका साथ सबका विकास” जैसी बातों के नारे लगाए जा रहे हैं, लेकिन इसमें लगता है कि दलित इससे बाहर हैं. इसलिए दलित भी इसको महसूस करने लगे हैं कि उनको इस गुजरात मॉडल में क्रूरता और हिंसा के अलावा और कुछ नहीं मिलने वाला है.

सुरभि वाया: आनंदीबेन पटेल और नरेंद्र मोदी सरकारों में आप क्या फर्क देख सकते हैं?

 
जिग्नेश मेवाणी: कोई फर्क नहीं है. मोदी हुकूमत के दौरान एससी, एसटी या ओबीसी के बीच जमीन बांटने के बजाए इसको अडाणी, अंबानी और एस्सार को दिया गया. आनंदीबेन ने भी यही मॉडल आगे बढ़ाया है. इसके अलावा, चूंकि मोदी दिल्ली पहुंच गए थे इसलिए आनंदीबेन की हुकूमत में एग्रीकल्चल लैंड सीलिंग एक्ट में भी फेर-बदल किया गया, जो भूमिहीनों को जमीन देने के प्रावधान वाला एक प्रगतिशील कानून था. इनमें से किसी भी हुकूमत ने जातीय हिंसा और दलित अधिकारों के मुद्दों पर कोई काम नहीं किया है.

सुरभि वाया: गुजरात में दलितों और दलित आंदोलनों के इतिहास पर कुछ कह सकेंगे?

 
जिग्नेश मेवाणी: 1980 के दशक में अनेक गैर दलित भी [दलित] आंदोलन का हिस्सा बने. दलित पैंथर्स का हमेशा ही एक बहुत रेडिकल, प्रगतिशील एजेंडा और घोषणापत्र था. दलित आंदोलन का यह एक पहलू है. इसकी वजह से एक जुझारू मानसिकता विकसित हुई – मतलब अगर रूढ़िवादी उनसे अच्छे से पेश नहीं आए तो फिर हिंसक प्रतिक्रिया होगी. संदेश साफ था, कि वे अपने अधिकारों के लिए अथक रूप से लड़ सकते हैं. [दलित पैंथर] के घोषणापत्र में दिए गए कार्यक्रम में मजदूर संघ बनाने, बुनियादी अधिकारों के लिए लड़ने, जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ लड़ने जैसी बातें शामिल थीं. लेकिन ये साकार नहीं हो सकीं. सिर्फ घोषणापत्र का नाम बदल दिया गया.

दूसरी तरफ गुजरात में बहुत थोड़ी प्रगतिशील ताकतें रही हैं जो दलितों की स्वाभाविक सहयोगी बन सकती थीं. इसके साथ साथ जब वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियां आईं तो पहचान की राजनीति भी एक बड़ा फैक्टर बनी. भारत भर में दलित आंदोलन इस राजनीति की गिरफ्त में आ गए. 1990 के दशक के बाद दलित आंदोलन जातिवाद से लड़ने, मनुवाद मुर्दाबाद की जुमलेबाजी में फंस गया और इसने इन मुद्दों को नहीं उठाया कि दलितों के पास रोटी, छत और घर जैसी बुनियादी चीजें हासिल हों. हमेशा ही ऐसे संगठन, लोग और संस्थान रहे हैं जिन्होंने दलितों के मुद्दों को उठाया, खास कर अत्याचारों और जमीन के संघर्ष को उठाया. लेकिन एक ऐसा मंच अभी बनना बाकी है जो इन सभी विचारों को एक साथ ला सके और मुद्दों के सामने रख सके.

गुजरात में जहां तक दलित आंदोलनों की बात है पिछले दो या तीन दशकों में मैं बस यही देख सकता हूं कि ऐसे लोग हैं जो काम करना चाहते हैं और अच्छा काम कर रहे हैं. ऐसा जज्बा है कि अन्याय को रोकने के लिए काम किया जाए, लेकिन इसके लिए मिलजुल कर एक वैचारिक नजरिया नहीं बनाया जा सका और जमीन पर काम करने वाले लोग दीर्घ कालिक बदलाव लाने के लिए दूसरों के साथ एकजुट नहीं हो सके. इसलिए एक बड़े दलित आंदोलन के खड़े होने की जो उम्मीद थी वो पूरी नहीं हो सकी.

दूसरी तरफ पहचान की राजनीति की वजह से, खास कर मोदी की हुकूमत के दौरान, एक तरफ तो उनका एजेंडा सांप्रदायिक फासीवाद का एडेंडा था और दूसरी तरफ यह वैश्वीकरण का एजेंडा है: भौतिक विरोधाभास बढ़े हैं, गरीबों और अमीरों के बीच गैरबराबरी बढ़ी है, निचली जातियों, निचले वर्गों को काफी भुगतना पड़ा है.

उना का मुद्दा इतना बड़ा क्यों बन गया? इसलिए क्योंकि इसके लिए अब इंतजार नहीं करना था कि पानी के सिर के ऊपर बहेगा. ऐसा होना ही था, क्योंकि गुजरात में ज्यादातर दलित भूमिहीन हैं. यहां गहरा खेतिहर संकट है. ग्रामीण इलाकों में दलित वर्ग का भारी शोषण होता रहा है. शहरों में रहने वाला दलित मुख्यत: औद्योगिक मजदूर है, निजी कंपनियों के लिए काम करता है...

सुरभि वाया: टेक्सटाइल मिल मजदूरों की तरह जिन्होंने 1980 के दशक में यूनियन बनाने की मांग की थी?

जिग्नेश मेवाणी: हां, लेकिन कारखाने के मजदूरों और खेतिहर मजदूरों में एक फर्क है. दलित कारखाना मजदूरों के वक्त उम्मीद थी, संघर्ष की बड़ी चाहत थी और वह खेतिहर मजदूरों में जिंदा थी. इसलिए तब एक बार्गेनिंग पावर थी. कारखानों के आसपास कारखाना मालिकों ने शेल्टर बनाए जहां मजदूरों को रहने के लिए घर दिए. इसलिए एक तरह की एकता थी. लेकिन जो लोग मॉलों में या निजी कॉरपोरेट घरानों में काम करने गए वो बिखरे हुए हैं. उनके बीच का संपर्क भी बहुत कमजोर है. अगर मोदी सरकार उन्हें 4000 रुपए माहवार की नौकरी देना जारी रखती है तो हम औद्योगिक मजदूरों के हालात का अंदाजा लगा सकते हैं. इस तरह एक शहर के औद्योगिक इलाकों में काम करने वाले दलित और भूमिहीन ग्रामीण दलित: इन दोनों ही समूहों का शोषण पिछले 12 से 15 बरसों में बहुत खराब हुआ है.

इनके अलावा अत्याचारों के मामले भी बढ़े हैं. मोदी सरकार के दौरान 2003 से 2014 तक 14,500 मामले दर्ज किए गए थे. 2004 में 34 अनुसूचित जाति की महिलाओं का बलात्कार हुआ था, जो 2014 में बढ़ 74 तक पहुंच गया. 2005 से 2015 के बीच 55 गांवों से दलितों को हिंसक तरीके से बाहर किया गया है – उन्हें वो गांव छोड़ने पड़े जहां वे रहते थे. 55,000 से ज्यादा सफाई कर्मी हैं जो मैला साफ करते हैं. करीब एक लाख सफाई कर्मी हैं जो नगर निगमों में बरसों से न्यूनतम मजदूरी पर काम करते आ रहे हैं और अभी भी स्थायी नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इसतरह एक ओर तो भारी आर्थिक शोषण है और दूसरी तरफ जाति के आधार पर उन्हें जीवन के हर पहलू में दबाया जाता है. 2012 में राज्य पुलिस ने 16, 17 और 21 साल के तीन दलित नौजवानों को इतने बुरे तरीके से पीटा कि एक तरह से उनकी खाल उधड़ गई थी, और बाद में उन्हें एके-47 से गोली मारी गई क्योंकि वे एक दिन पहले हुए अत्याचार के एक मामले में रिपोर्ट दर्ज कराने जा रहे थे. चार बरसों के बाद भी इस मामले में कोई इंसाफ नहीं हुआ है. दलित अत्याचारों के मामलों में गुजरात में कसूर साबित होने की दर महज तीन फीसदी है – 97 फीसदी लोग बस तोड़ दिए जा रहे हैं.

उनके लिए गुजरात में कोई इंसाफ नहीं है. यह बात अरसे से मन में जमा होती रही है.

सुरभि वाया: 2015 में आपने एक आरटीआई दायर किया था जिसमें आपने गुजरात में दलितों के बीच जमीन के बंटवारे के बारे में कुछ दिलचस्प संख्याएं शामिल की थीं.

जिग्नेश मेवाणी:
आरटीआई को लेकर मेरे काम का मुख्य सरोकार भूमिहीन खेतिहर मजदूरों और दलितों से रहा है, खास कर जमीन के अधिकार से. भारत ऊंची जातियों, ऊंचे वर्गों का एक जमावड़ा है, है न? अगर आप ऑब्जेक्टिवली देखें तो राज्य के सभी अंगों पर ऊंची जातियों और ऊंचे वर्ग की इस जोड़ी का कब्जा है. उत्पादन के सभी साधन उनके हाथों में हैं और खास कर उनका जमीन पर कब्जा है. देहाती इलाकों में ऊंची जातियों का दबदबा खास कर उनके द्वारा जमीन पर कब्जे की वजह से ही है. इसलिए भूमि सुधार बेहद जरूरी हैं.

गुजरात में, खास कर हरेक जिले में, दलितों को हजारों एकड़ जमीन दिया जाना एक मजाक है. यह सिर्फ कागज पर ही हुआ है. मिसाल के लिए, आप कल्पना करें कि मुझे जमीन का मालिकाना दिया गया है. मुझे कागज का एक पर्चा मिलेगा जिसमें लिखा होगा, मैं, जिग्नेश मेवाणी, मेरे पास सर्वे नंबर है जो इसका सबूत है कि मेरे पास एक निश्चित गांव में छह बीघे जमीन है. लेकिन जमीन पर असली कब्जा हमेशा ही ऊंची और प्रभुत्वशाली जातियों का बना रहेगा. इसका मतलब है कि उनको [दलितों को] 1000 एकड़ जमीन मिली है लेकिन सिर्फ कागज पर. असली, जमीनी कब्जे की गारंटी कभी नहीं दी गई.

सुरभि वाया: मेरे मां-बाप बताते हैं कि जब वे सबसे पहले अहमदाबाद रहने आए तो यहां घेट्टो नहीं थे और ये बस हाल की परिघटना है.

जिग्नेश मेवाणी: यह मोदी मैजिक है. [2002] दंगों में नरोदा पाटिया, नरोदा गाम, गुलबर्ग, सरदारपुरा और बेस्ट बेकरी में जिस तरह मुसलमानों को मारा गया...इसके बाद उनके पास कोई और विकल्प नहीं था. वे हिंदू इलाकों में किस तरह रहेंगे? वे अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहते और रहने का ठिकाना खोज रहे हैं. आनंदीबेन मेहसाना से आती हैं, प्रधानमंत्री मोदी भी वहीं से आते हैं और राज्य के गृह मंत्री भी वहीं से आते हैं. उसी मेहसाना जिसे में पिछले तीन महीनों में, चार गांवों में दलितों का सामाजिक बहिष्कार हुआ है और उन्हें उनके घरों से निकाल दिया गया है. दंगों के नतीजे में मुसलमान भारी तादाद में उन जगहों से उजड़ गए जहां वे पले-बढ़े थे और इन घेट्टो में चले आए. उसी तरह ये मनुवादी ताकतें दलितों को उनके गांवों से जबरन खदेड़ रही हैं.

सुरभि वाया: दलित-मुसलमान एकता के हालिया आह्वान पर आप क्या सोचते हैं?

जिग्नेश मेवाणी:
यह सचमुच, सचमुच एक अच्छी बात है. मैंने मुकुल सिन्हा और निर्झरी सिन्हा के साथ करीब 8 बरसों तक काम किया है. [मुकुल सिन्हा एक जाने माने एक्टिविस्ट और मानवाधिकार वकील थे. वो और उनकी पत्नी निर्झरी सिन्हा गुजरात में मोदी सरकार के मुखर विरोधी थे. निर्झरी अभी जन संघर्ष मंच चलाती हैं, जो उन्होंने शुरू किया था]. मैंने 2002 दंगों के बाद होने वाली घटनाओं पर नजर रखी है और मैंने राज्य में मुठभेड़ों में की जानेवाली हत्याओं में अमित शाह और नरेंद्र मोदी की भूमिका पर भी नजर रखी है. इन मुद्दों से मेरा सरोकार
ठीक उन्हीं वजहों से था और मैं उन मुद्दों में पड़ा, जिन वजहों से मैंने दलित अधिकारों के लिए काम शुरू किया. इसलिए मैं हमेशा ही चाहता रहा हूं कि एक दलित-मुसलमान एकता का आह्वान किया जाना चाहिए, कि उन्हें एक मंच पर लाया जाना चाहिए. आने वाले दिनों में इन दोनों समूहों को एकजुट करने के लिए ज्यादा ठोस कदम उठाए जाएंगे.

सुरभि वाया: तो बाकी के देश में हिंदू गिरोहों के सिलसिले में जो हो रहा है उसमें और गुजरात के हालात में आप संबंध और फर्क देखते हैं?

जिग्नेश मेवाणी: जबसे मोदी केंद्र में गए हैं, संघ परिवार के छुटभैए समूह ज्यादा सक्रिय हो गए हैं. भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट लूट और हिंदुत्व एजेंडा को आगे बढ़ाना उनकी [आनंदीबेन पटेल] सरकार का भी मुख्य मुद्दा रहा है. एक बड़ा फर्क यह रहा कि आनंदीबेन आतंक के उस राज को जारी नहीं रख सकीं.

राह दिखाता गुजरात: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/11/2016 10:34:00 PM



उना से शुरू होकर पूरे गुजरात में फैल चुके दलित आंदोलन ने न सिर्फ दलितों की मुक्ति की राह दिखाई है, बल्कि यह देश भर में उत्पात मचाने वाले सांप्रदायिक-जातिवादी हत्यारे गिरोहों का एक मुंहतोड़ जवाब भी पेश कर रहा है. यह आंदोलन इसलिए भी अनोखा है कि इसने भारतीय समाज के एक और सबसे सताए हुए समुदाय मुसलमानों को अपने साथ जोड़ा है. दलित-मुस्लिम एकता की यह मिसाल किसी चुनावी फायदे के लिए नहीं है बल्कि यह जुल्म और शोषण से अपनी आजादी के लिए एक शानदार कोशिश है. आनंद तेलतुंबड़े का लेख. अनुवाद: रेयाज उल हक.

गुजरात में मोटा समाधियाला गांव और उना कस्बे में हुए अत्याचारों के खिलाफ भड़के दलितों के आंदोलन में दलितों के नए सिरे से जाग उठने संकेत हैं. 11 जुलाई को यहां एक परिवार और इसके चार दलित नौजवानों को गाय की रक्षा की ठेकेदारी करने वाले गिरोह ने सबकी आंखों के सामने पीटा. 1970 के दशक में दलित पैंथर्स के बाद से कभी भी दलितों ने कभी भी इतने बागी तरीके से और भौतिक सवालों के साथ कोई पलटवार नहीं किया था. यों, देश में दलितों पर अत्याचार हर जगह होते हैं और गुजरात में जो कुछ हुआ, वे उससे कहीं ज्यादा खौफनाक होते हैं. लेकिन दूसरे अत्याचारों और उना में हुए इस अत्याचार में फर्क बस वो दुस्साहस है, जिसके साथ हमलावरों ने अपनी कार्रवाई का वीडियो बना कर इसे सोशल मीडिया पर डाल दिया. इससे जाहिर होता है कि उनको इस बात का पक्का यकीन था कि उन्हें अपने अपराधों के लिए कभी भी सजा नहीं मिलेगी. 2002 में इसी तरह के गौरक्षा के गुंडों ने दुलीना (झज्झर), हरियाणा में पांच दलितों को पीट-पीट कर मार देने के बाद उनमें आग लगा दिया था और इस घटना को छोड़ दें तो ऐसी घटनाओं की कभी भी ऐसी कोई जोरदार प्रतिक्रिया नहीं हुई. खुद गुजरात में ही सितंबर 2009 में सुरेंद्रनगर जिले के थानगढ़ में एक मेले में दलितों और ऊंची जाति के नौजवानों के बीच में एक छोटी सी झड़प में राज्य पुलिस ने तीन दलित नौजवानों को मार डाला था. बेशक, काफी हद तक थानगढ़ और ऐसी ही घटनाओं पर जमा हुए गुस्से और राज्य द्वारा इन अत्याचारों पर कोई भी कार्रवाई नहीं किए जाने से ही वह नाराजगी पैदा हुई है, जो मौजूदा आंदोलन के रूप में सामने आई है.

उना पुलिस थाने के करीब, कमर तक नंगे और एक एसयूवी में बंधे चार दलित नौजवानों को लोगों द्वारा सबकी नजरों के सामने बारी बारी से बेरहमी से पीटे जाने का वीडियो वायरल हुआ और इसने सब जगह पर गुस्से की एक लहर दौड़ा दी. शायद रोहिथ वेमुला के नक्शे कदम पर चलते हुए नाराजगी की पहली लहर में राज्य में अलग अलग जगहों पर करीब 30 दलित नौजवानों ने खुदकुशी करने की कोशिश की. इन्हीं में से कीटनाशक पी लेने वाले एक नौजवान 23 साल के योगेश सरिखड़ा की अस्पताल में मौत हो गई. लेकिन जल्दी ही इसके बाद विरोध का एक ऐसा बगावती तेवर सामने आया, जिसे आंबेडकर के बाद दलितों ने कभी भी नहीं आजमाया था. आंबेडकर ने दलितों से कहा था कि वे मवेशियों की लाशों को ढोना बंद कर दें. जब कुछ ब्राह्मणों ने यह दलील दी कि वे दलितों की कमाई का नुकसान कर रहे हैं, तो उन्होंने गुस्से में इसका जवाब देते हुए ऐलान किया था कि अगर दलित ऐसा करेंगे तो वे उन्हें नकद इनाम देंगे. बदकिस्मती से, सारे दलितों ने उनकी सलाह पर अमल नहीं किया और यह प्रथा आज तक चली आ रही है. आंबेडकर ने उन्हें ऐसे सभी पेशों को छोड़ने की सलाह भी दी थी, जो साफ-सुथरे नहीं हैं, लेकिन दलित कुछ तो अपने गुजर-बसर की जरूरतों के लिए और कुछ प्रभुत्वशाली समुदायों के दबाव के तहत उनको अपनाए हुए हैं. आधे पेट खा कर इज्जत के साथ जिंदगी गुजारने के अलावा आंबेडकर ने कोई और विकल्प नहीं पेश किया था. लेकिन गुजरात में चल रहे इस मौजूदा आंदोलन को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि इसने यह वाजिब मांग भी जोड़ी है कि अपने जातीय पेशों को छोड़ने वाले हरेक दलित को खेती लायक पांच एकड़ जमीन दी जाए.

इस रूप में दलितों के पास एक मजबूत हथियार तो है ही, उनके पास हिंदुत्व ब्रिगेड का एक मुंहतोड़ जवाब भी है, जिस पर गाय की रक्षा का सनक सवार है. घटना के एक हफ्ते बाद गांवों के बेशुमार दलित मरी हुई गाएं ट्रैक्टरों में भर कर ले आए और उन्हें गोंधल और सुरेंद्रनगर के सरकारी दफ्तरों के सामने डाल दिया. दलितों के इस स्वत:स्फूर्त आंदोलन का संयोजन करने के लिए
एक नौजवान दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी की पहल पर बनी उना दलित अत्याचार लड़त समिति ने ऐलान किया कि दलित मरे हुए मवेशियों को उठाना बंद कर देंगे. उन्होंने सरकार से कहा कि वे शिव सैनिकों और खुद को गौ रक्षक कहने वालों से कहे कि वे सड़ती हुई लाशें उठाएं और उनका संस्कार करें. टाइम्स ऑफ इंडिया (28 जुलाई 2016) ने खबर दी कि कुछ ही दिनों के भीतर सड़ती हुई लाशों की बदबू ने गौरक्षकों और उनके सरपरस्त, राज्य, के होश ठिकाने ला दिए. समिति ने दायरा बढ़ाते हुए मैला साफ करना बंद करने का आह्वान भी किया है, जिसके वजूद को खुद अपनी ही एजेंसियों द्वारा कबूल किए जाने के बावजूद सरकार लगातार नकारती रही है. अगर दलितों ने सामूहिक रूप से अपने दलितपन से जुड़े बस इन दो कामों को छोड़ने का फैसला कर लिया तो जाति के पूरे निजाम को शिकस्त दी जा सकती है. अपनी असुरक्षा और प्रभुत्वशाली समुदायों की तरफ से होने वाले जवाबी हमलों के डर से वे ऐसा करने में नाकाबिल रहे हैं. इन गंदे कामों में लगा दिए गए दलित मुख्यधारा से दूर, अलग-थलग कर दिए जाते हैं, जिनके लिए सामाजिक तौर पर ऊपर उठने की गुंजाइश न के बराबर होती है.


गुजरात को हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला के रूप में लिया जाता रहा है, जहां हम इसके असली चेहरे को साफ-साफ देख पाते हैं. एक तरफ जहां 2002 के कत्लेआम के जरिए मुसलमानों को उनकी हैसियत साफ-साफ बता दी गई कि भारत में रहने का अकेला तरीका यह है कि उन्हें हिंदुत्व की शर्तों पर रहना होगा और इस्लामी हिंदू बनना कबूल करना होगा. वहीं दूसरी तरफ दलितों को अपने साथ मिला कर, इनाम देकर या सजाओं की अनेक तहों वाली तरकीबों के जरिए उलझाए रखा गया. पहले 1981 में और 1985 में फिर से आरक्षण संबंधी दंगों में दलितों को इसी से मिलता-जुलता सबक सिखाया गया था, जो 2002 में मुसलमानों पर हुए हमलों से कहीं ज्यादा व्यापक थे और कहा जाता है कि जिनमें करीब 300 दलितों ने अपनी जान गंवाई थी. बार-बार होने वाले इन हमलों ने पहले से ही कमजोर उनकी चेतना पर अंकुश लगा दिए और जल्दी ही उन्हें 1986 के जगन्नाथ यात्रा जुलूसों में शामिल होते हुए देखा गया. लेकिन उनके दुख-दर्द पर इस मेल-मिलाप का कोई फर्क नहीं पड़ा. इसके उलट उन्होंने पाया कि उनकी बदहाली साल दर साल बढ़ती ही जा रही है, जैसा कि अत्याचारों के आंकड़े इसे उजागर करते हैं. आमफहम धारणा के उलट, दलितों पर अत्याचार करने में गुजरात हमेशा ही सबसे ऊपर के राज्यों में रहा है. भाजपा ने कभी भी यह दावा करने का मौका हाथ से जाने नहीं दिया कि गुजरात दलितों के खिलाफ अपराधों की सबसे कम दरों वाला राज्य है. हाल ही में इसने पिट्ठू ‘दलित नेताओं’ और ‘बुद्धिजीवियों’ का एक जमावड़ा खड़ा किया है, जो इसकी तरफ से यही राग अलापने का काम कर रहा है.

मिसाल के लिए उना अत्याचारों के संदर्भ में एनडीटीवी पर एक बहस के दौरान और फिर इसके बाद द वीक (7 अगस्त 2016) में लिखे गए एक लेख में नरेंद्र जाधव ने यह दिखाने की कोशिश की कि गुजरात बड़े अत्याचारी राज्यों में नहीं आता. संघ परिवार के साथ अपने तालमेल के लिए राज्य सभा सीट से नवाजे गए जाधव ने बताया, “2014 में ऊपर के तीन राज्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार थे. अब बहस का मुद्दा बने गुजरात में असल में 2014 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों की कहीं कम दर – 2.4 फीसदी – रही है जबकि ऊपर बताए गए राज्यों में यह 17 फीसदी से 18 फीसदी रही है.” उन्होंने जानबूझ कर गलत आंकड़े बताए. क्राइम इन इंडिया 2014 में तालिका 7.1 घटनाओं की दरें मुहैया कराती है, जिनमें गुजरात की दर 27.7 (प्रति लाख एससी आबादी पर अत्याचारों की संख्या) है जो उत्तर प्रदेश के 18.5 से कहीं अधिक है. दिलचस्प बात यह है कि 2014 में गुजरात की हालत बेहतर दिखती है. इसके पहले से बरसों में गुजरात अत्याचारों के मामले में लगातार ऊपर के चार से पांच राज्यों में आता रहा है. 2013 में, जब आने वाले आम चुनावों और प्रधान मंत्री पद के लिए उनकी उम्मीदवारी की ताजपोशी के दौर में नरेंद्र मोदी का वाइब्रेंट गुजरात प्रचार अभियान अपने चरम पर पहुंचा, दलितों के खिलाफ अपराधों की दर इसके पहले वाले साल 2012 के 25.23 से बढ़ कर 29.21 हो गई थी. इसने राज्य को देश का चौथा सबसे बदतर राज्य बना दिया. हत्या और बलात्कारों जैसे बड़े अत्याचारों के मामले में भी गुजरात ज्यादातर राज्यों को पीछे छोड़ते हुए ऊपर बना हुआ है. [देखें मेरा लेख: क्यों भाजपा के खिलाफ खड़े हो रहे हैं दलित]

गुजरात में दलितों के आंदोलन ने सीधे-सीधे इन मतलबी दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों को किनारे कर दिया है. इसने दिखाया है कि दलितों का सामूहिक आक्रोश खुद ही अपना चेहरा, अपने संसाधन और अपनी विचारधारा हासिल कर लेता है. द्वंद्ववाद का यह अनोखा फेर है कि दलितों की मुसीबतों का हल हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला में तैयार हो रहा है!

क्यों भाजपा के खिलाफ खड़े हो रहे हैं दलित: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/09/2016 01:23:00 PM


गुजरात और महाराष्ट्र में चल रहे दलित आंदोलनों के संदर्भ में आनंद तेलतुंबड़े का लेख. अनुवाद: रेयाज उल हक
 

हाल ही में सहज रूप से शुरू हुए दलित आंदोलनों की लहर में एक खास भाजपा-विरोधी रंग है. चाहे वह रोहिथ वेमुला की सांस्थानिक हत्या पर देश भर के छात्रों का विरोध हो या फिर गुजरात में सबकी आंखों के सामने चार दलित नौजवानों को सरेआम पीटे जाने की शर्मनाक घटना पर राज्य में चल रहा विरोध हो, या फिर मुंबई में ऐतिहासिक आंबेडकर भवन को गिराए जाने पर 19 जुलाई को होने वाला विरोध प्रदर्शन हो, या राजस्थान में एक नाबालिग स्कूली छात्रा के कथित बलात्कार और हत्या पर उभरा गुस्सा हो या फिर उत्तर प्रदेश में मायावती के लिए भाजपा के उपाध्यक्ष द्वारा की “वेश्या वाली टिप्पणी” पर राज्य में होने वाला भारी विरोध हो, भाजपा के खिलाफ दलितों के गुस्से को साफ-साफ महसूस किया जा सकता है. भाजपा के दलित हनुमान चाहे इस आग को जितना भी बुझाने की कोशिश करें, यह नामुमकिन है कि अगले साल राज्यों में होने वाले चुनावों तक यह बुझ पाएगी. इससे भी बढ़ कर, इन प्रदर्शनों में उठ खड़े होने का एक जज्बा भी है, एक ऐसा जज्बा जिसमें इसका अहसास भरा हुआ है कि उनके साथ धोखा हुआ है. अगर यह बात सही है तो फिर यह संघ परिवार के हिंदू राष्ट्र की परियोजना की जड़ों में मट्ठा डाल सकती है.

रोहिथ की बार-बार हत्या

रोहिथ की संस्थागत हत्या के बारे में अब सब इतना जानते हैं कि उस पर यहां अलग से चर्चा करना जरूरी नहीं है. लेकिन जिस तरीके से उसको दबाने की कोशिश हो रही है वो हत्या से कम आपराधिक नहीं है. गाचीबावड़ी पुलिस ने हैदराबाद केंद्रीय विवि के विवादास्पद वाइस चांसलर अप्पा राव पोडिले, भाजपा सांसद और मोदी के मंत्रिमंडल के मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और एचसीयू में एबीवीपी के अध्यक्ष एन. सुशील कुमार के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए उत्पीड़न अधिनियम के तहत एक मामला दर्ज किया है. लेकिन पुलिस ने कभी इस पर कार्रवाई नहीं की. रोहिथ की मौत ने छात्रों में आंदोलन की चिन्गारी सुलगा दी थी, जिन्होंने देश भर में ज्वाइंट एक्शन कमेटियां गठित की थीं. इसने अप्पा राव को कैंपस से भाग जाने पर मजबूर किया था.

लेकिन 22 मार्च को, मामला थोड़ा ठंडा पड़ता दिखने पर वो एकाएक वापस लौटे. स्वाभाविक रूप से आंदोलनकारी छात्रों ने वाइस-चांसलर के आवास के बाहर, जहां वे एक मीटिंग कर रहे थे, एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया. उन्हें पुलिस की एक बड़ी सी टुकड़ी ने घेर रखा था. जब आंदोलनकारी छात्रों ने एबीवीपी के सदस्यों को इमारत के भीतर देखा तो उन्हें बड़ा धक्का लगा. उन्होंने भीतर जाना चाहा. दरवाजे पर होने वाली इस धक्का-मुक्की की ओट में पुलिस ने गंभीर लाठी चार्ज किया. पुलिस से बातें करने गए दो फैकल्टी सदस्यों को भी नहीं छोड़ा गया. उन्होंने छात्रों को कई किलोमीटर तक झाड़ियों में खदेड़ते हुए पीटा. उन्होंने लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ भी की.

सभी 27 छात्र और दो फैकल्टी सदस्य प्रो. के.वाई. रत्नम और तथागत सेनगुप्ता को दो पुलिस वैनों में भर दिया गया और फिर हैदराबाद की सड़कों पर घंटों तक चक्कर लगाती उन वैनों में उन पर बेरहम हमलों का एक नया दौर शुरू हुआ. देर शाम तक उनके ठिकाने की कोई खबर नहीं थी. आखिर वे सात दिनों तक कैद रहने के बाद जमानत पर ही बाहर आ सके. रोहिथ को इंसाफ देने का तो सवाल ही नहीं था, जो लोग इसकी मांग कर रहे थे उन्हें ही सजाएं दी जा रही थीं.

मानो इतना ही काफी न हो, गिरफ्तार किए गए प्रोफेसरों को बाद में निलंबित कर दिया गया. जब विवि के प्रवेश द्वार के बाहर उन्होंने अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल करते हुए इसका विरोध किया तो जनता और अनेक प्रगतिशील संगठनों की ओर से समर्थन की बाढ़ आ गई. नतीजों से डरे हुए अप्पा राव के होश ठिकाने आए और उन्होंने निलंबन के आदेश वापस लिए.

विवादास्पद मंत्री और सबसे अहम मानव संसाधन मंत्रालय का नेतृत्व करने के लिहाज से सबसे नाकाबिल स्मृति ईरानी ने अपने और अपने चापलूसों की करतूतों को जायज ठहराने के लिए संसद में झूठ का पुलिंदा पेश करने में अपना सारा का सारा नाटकीय कौशल लगा दिया. जो कुछ हुआ था, उस पर पछताने के बजाए उन्होंने रोहिथ के इंसाफ का आंदोलन करने वालों पर आक्रामक हमला किया. रोहिथ की जाति पर सवाल उठा कर इस मामले को भटकाने की घिनौनी कौशिशें की गईं मानो उनका दलितपन उन्हें हाथोहाथ इंसाफ दिला देगा और उनका दलित न होना अपराधियों के अपराध को हल्का कर देगा.

तेलंगाना राज्य की पूरी ताकत – जिसके लिए करीब 600 लोगों ने अपनी जान दे दी थी और उनमें से अनेक दलित थे – मातम में डूबी हुई मां पर टूट पड़ी कि वो अपनी जाति साबित करें. रोहिथ के पास दलित होने का जाति प्रमाणपत्र होने के बावजूद, एक दलित की जिंदगी जीने और मरने के बावजूद, तेलंगाना प्रशासन ने यह अफवाह फैलाई कि वो दलित नहीं, एक वड्डेरा थे. यह साबित करने के लिए परिवार को जगह-जगह दौड़ाया गया कि रोहिथ असल में एक दलित थे. उन्हें अपने बेटे को खो देने के दर्द को परे कर देना पड़ा. किस्मत से सरकार की सारी तरकीबें नाकाम रहीं और रोहिथ का दलित होना साबित हुआ.

जैसी कि उम्मीद थी, अपराधियों पर इसका कोई भी फर्क नहीं पड़ा. वे सभी ताकत के अपने पदों पर जमे हुए हैं, जबकि इंसाफ के लिए संघर्ष कर रहे छात्रों को आखिरी हदों तक धकेला जा रहा है. अप्पा राव ने उस दलित वीथि को हटा दिया है, जो रोहिथ और उनके चार निष्कासित साथियों की आखिरी शरण स्थली थी, जिसे उन्होंने शॉपकॉम पर खड़ा किया था. यह जगह मौजूदा आंदोलन का एक प्रतीकात्मक केंद्र थी. वहां लगाई गई आंबेडकर की प्रतिमा भी चुरा ली गई और रोहिथ के अस्थायी स्मारक पर लगाए गए रोहिथ के पोर्ट्रेट को बिगाड़ दिया गया.

गुजरात में गुंडागर्दी

11 जुलाई को गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में उना तालुका के मोटा समाधियाला गांव में एक दलित परिवार, जाति द्वारा नियत अपने पेशे के मुताबिक एक मरी हुई गाय का चमड़ा उतार रहा था, कि गौ रक्षा समिति का भेस धरे शिव सेना का एक समूह उनके पास पहुंचा. उन्होंने गाय की हत्या करने का आरोप लगाते हुए पूरे परिवार को पीटा और फिर चार नौजवानों को उठा लिया. उन्होंने उनकी कमर में जंजीर बांध कर उन्हें एक एसयूवी से बाध दिया और फिर उन्हें घसीटते हुए उना कस्बे तब ले आए, जहां एक पुलिस थाने के करीब उनको कई घंटों तक सबकी नजरों के सामने पीटा गया.

हमलावरों को इस बात को लेकर यकीन था कि उन्हें इसपर कभी भी किसी कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा, इसलिए उन्होंने अपनी इस खौफनाक हरकत का वीडियो बनाया और उसे सार्वजनिक भी किया. लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया. इससे भड़क उठे दलित खुद ब खुद सड़कों पर उतर पड़े. हालांकि गुजरात कभी भी दलितों की स्थिति के लिहाज से आदर्श राज्य नहीं रहा था, लेकिन यह दलितों पर ऐसे दिन-दहाड़े अत्याचार का कभी गवाह नहीं रहा था.

राज्य भर में दलितों के भारी विरोध प्रदर्शनों की एक स्वाभाविक लहर दौड़ गई. करीब 30 दलितों ने अपने समुदाय के साथ होने वाली नाइंसाफियों को उजागर करने के लिए खुदकुशी करने की कोशिश की. लेकिन सबसे समझदारी भरी कार्रवाई मवेशियों की लाशों को अनेक जगहों पर कलेक्टर कार्यालयों के सामने डाल देना था. दलितों ने एकजुटता जाहिर करने की एक गैरमामूली कदम उठाते हुए लाशें उठाने और उनका चमड़ा उतारने का अपना परंपरागत काम रोक दिया और इस तरह इनसे होने वाली आमदनी की भी कुर्बानी दी.

28 जुलाई के द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में हर जगह सड़ती हुई लाशें एक महामारी का खतरा बन गई हैं. पशुपालन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक गुजरात में करीब एक करोड़ गाएं और भैंसें हैं जिनके मरने की दर 10 फीसदी है. इसका मतलब ये है कि हर रोज राज्य भर में 2,740 मवेशी मरते हैं. किसी जगह पर ऐसी ही पड़ी एक लाश की बदबू जनता की बर्दाश्त से बाहर हो जाती है, और ऐसे में ऊपर दी गई तादाद तो एक तबाही ही ला सकती है.

गौ रक्षा संस्थाओं को होश आ गया है और वे यह कबूल करने को मजबूर हुई हैं कि वो इस समस्या के बारे में नहीं जानती थीं और अब वे लाशों का निबटारा करने के तरीके खोजेंगी. अगर देश भर के नहीं तो पूरे राज्य में मैला ढोने के काम में लगे दलितों (सरकारों द्वारा कसम खा कर उनके वजूद को नकारने के बावजूद उनकी तादाद हजारों में है) और इसी तरह पूरे राज्य के सफाई कर्मियों को भी इस विरोध का हिस्सा बन जाना चाहिए.

आंबेडकर की विरासत चकनाचूर

25 जून की रात में आंबेडकरियों का भेस धरे सैकड़ों गुंडे दो बुलडोजर लेकर आए और उन्होंने मुंबई में दादर में स्थित ऐतिहासिक आंबेडकर भवन और आंबेडकर प्रेस को गिरा दिया. ऐसा उन्होंने रत्नाकर गायकवाड़ के कहने पर किया, जो एक रिटायर्ड नौकरशाह हैं और मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में अपनी नियुक्ति करवाने में कामयाब रहे हैं. प्रेस का एक ऐतिहासिक मूल्य था, क्योंकि उसका संबंध बाबासाहेब आंबेडकर से था. उनके अहम अखबारों में से दो जनता और प्रबुद्ध भारत यहीं से छपते और प्रकाशित होते थे और यह 1940 के दशक में आंबेडकरी आंदोलन का एक केंद्र भी था. उनके निधन के बाद भी यह एक केंद्र बना रहा; भूमि संघर्ष पर आंदोलन, ‘रिडल्स’ विवाद पर आंदोलन और नामांतर संघर्षों की योजना यहीं बनी और उन अमल हुआ.

दूसरी इमारत आंबेडकर भवन एक एकमंजिला, अंग्रेजी के ‘यू’ अक्षर के उल्टे शक्ल की थी जिसे 1990 के दशक में बनाया गया था. इन दोनों इमारतों को गिराने के लिए जिस बहाने की ओट ली गई, कि वे ढांचागत रूप से खतरनाक थे, वे जाहिर तौर पर गायकवाड़ द्वारा ‘गढ़े’ गए थे. इस दुस्साहस भरी कार्रवाई से और इससे भी ज्यादा जिस शर्मनाक और उद्दंड तरीके से उसको जायज ठहराया जा रहा था, उससे लोग भौंचक रह गए. जैसा कि इसके पहले और इसके बाद होने वाली घटनाओं ने उजागर किया, गायकवाड़ राज्य में भाजपा के दिग्गजों के हाथों का मोहरा भर थे.

ट्रस्ट की विवादास्पद स्थिति से वाकिफ मुख्यमंत्री ने प्रस्तावित 17 मंजिला आंबेडकर भवन के लिए चोरी-छिपे भूमिपूजन किया (और मजे की बात है कि यह पूजा कहीं और की गई) और इसके लिए 60 करोड़ के अनुदान का ऐलान भी किया. 25 जून को जो कुछ हुआ था, वह खुल्लम-खुल्ला एक आपराधिक करतूत थी, जिसको मजबूरन गायकवाड़ को कबूल करना पड़ा. उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा करने से बचने के लिए उनकी संवैधानिक हैसियत का एक झूठा बहाने को सामने कर दिया गया.

गायकवाड़ और भाजपा सरकार के अपराधों से नाराजगी के साथ 19 जुलाई को मुंबई में एक भारी मोर्चा निकाला गया. घटनाओं के इस पूरे सिलसिले ने दलितों के भीतर वर्गीय बंटवारे को सबसे बदसूरत तरीके से उजागर किया. जहां उच्च मध्य वर्ग के दलितों ने गायकवाड़ का समर्थन किया, जिसमें प्रवासी दलित (डायस्पोरा) तबका और दलित नौकरशाहों से मिले हराम के पैसों पर आरामतलबी की जिंदगी जीते बौद्ध भिक्षु भी शामिल हैं. दूसरी तरफ दलितों की व्यापक बहुसंख्या ने उनकी गिरफ्तारी की मांग की और आंबेडकर परिवार का समर्थन किया जो गायकवाड़ के खिलाफ खड़े थे. बाबासाहेब आंबेडकर के तीनों पोते आमतौर पर स्वतंत्र रहे हैं और कांग्रेस या भाजपा के साथ सहयोग करने से इन्कार किया है.

राजनीतिक रूप से उनका नजरिया अवाम के हक में रहा है और उन्होंने जनसंघर्षों का समर्थन किया है. चाहे जितना भी कमजोर हो, आज वे अकेले आंबेडकरी प्रतिष्ठान है जो पूरी मजबूती से हिंदुत्व ताकतों के खिलाफ हैं.

इसलिए भाजपा के लिए उनकी छवि को बदनाम करना जरूरी है. इस काम को पूरा करने के लिए मध्यवर्ग के दलितों के एक हिस्से को चुपचाप उकसाया जा रहा है. धीरे-धीरे उन्होंने यह प्रचार खड़ा किया है कि बाबासाहेब आंबेडकर के वारिस आंबेडकरी नहीं बल्कि माओवाद के समर्थक हैं. कम से कम एक दलित अखबार महानायक पिछले पांच बरसों से इस झूठ को पूरे उन्माद के साथ फैलाता आ रहा है. इमारतों को तोड़े जाने के इस पूरे नाटक के जरिए भाजपा का इरादा इसी मकसद को हासिल करने का था. गायकवाड़ ने तीनों पोतों और उनके पिता यशवंतराव आंबेडकर को गैर कानूनी कब्जा करने वाले नालायक और गुंडा बताया.

आंबेडकर भवन को गिराना और आंबेडकर के परिवार की छवि को मिट्टी में मिलाना, गायकवाड़ के ये वो दो जुड़वां काम थे जिनके लिए उन्हें देश भर में भड़कते जनता के गुस्से की अनदेखी करते हुए भाजपा सरकार से समर्थन मिल रहा है. इस खुलेआम आपराधिक मामले में पुलिस और राज्य मशीनरी जिस तरह पेश आती रही है और आ रही है उसी से सरकार का तौर-तरीका साफ हो जाता है.

दलित ‘हनुमानों’ की बेशर्मी

भाजपा अपने तीनों दलित रामों को अपना ‘हनुमान’ बना देने में कामयाब रही है. उन्होंने कुछ तथाकथित दलित बुद्धिजीवियों को भी लालच देते हुए अपनी हां में हां मिलाने के लिए अपनी तरफ खींचा है. गुजरात में दलित नौजवानों को पीटे जाने पर देश भर में भड़क उठे गुस्से के ताप में भी, एक दलित ‘हनुमान’ ऐसा था जो बेशर्मी से यह कहता फिर रहा था कि दलितों पर अत्याचारों से गुजरात का नाम नहीं जोड़ा जाए. जिस तरह उन्होंने राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो (एनसीआरबी) के अपराध के आंकड़ों को गलत और संदर्भ से हटा कर पेश किया, उसी से उनकी गुलामी और बौद्धिक बेईमानी जाहिर होती है. एक तरफ जब गैर-दलित पैनलिस्ट गुजरात में भड़के गुस्से को जायज ठहरा रहे थे, यह पिट्ठू बड़े भद्दे तरीके से यह बहस कर रहा था कि जातीय अत्याचारों के मामले में गुजरात अनेक राज्यों से बेहतर है.

तथ्य ये है कि दलितों पर अत्याचारों की घटनाओं के मामले में गुजरात के सिर पर, ऊपर के पांच राज्यों में लगातार बने रहने का एक खास ताज रखा हुआ है. 2013 में जब आने वाले आम चुनावों और प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताजपोशी के मद्देनजर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘वाइब्रेट गुजरात’ का जाप चरम पर पहुंचा, अनुसूचित जातियों (एससी) की प्रति लाख आबादी पर अत्याचारों की तादाद उसके पहले वाले साल के 25.23 से बढ़ कर 29.21 हो गई. इसके नतीजे में राज्य देश का चौथा सबसे बदतर राज्य बन गया.

पहले गलत तरीका अपनाते हुए एनसीआरबी अत्याचारों की गिनती प्रति लाख आबादी पर करता आ रहा था; सिर्फ 2012 से यह प्रति लाख एससी आबादी के संदर्भ में घटनाओं को जुटा रहा है. इसलिए एनसीआरबी तालिकाओं में दी गई एससी के खिलाफ अपराध की घटनाओं की दरों को सही आंकड़ों में बदलने की जरूरत होगी, लेकिन उनसे भी राज्यों के बीच में गुजरात की तुलनात्मक स्थिति के बदलने की संभावना कम ही है.

हत्या और बलात्कार जैसे बड़े अत्याचारों के मामले में भी गुजरात बदतरीन राज्यों में से है. तालिका एक भारत के बड़े राज्यों में 2012 और 2013 के लिए इन अत्याचारों की दरें मुहैया कराती है, ताकि दिखाया जा सके कि कैसे दलितों के खिलाफ अपराधों के लिए गुजरात का नाम ऊपर के राज्यों में आता है.




तालिका साफ-साफ दिखाती है कि हत्याओं की दरों के मामले में 2012 में सिर्फ दो ही राज्य, उत्तर प्रदेश (0.57) और मध्य प्रदेश (0.78) गुजरात से आगे थे और 2013 में गुजरात साफ तौर पर उनका सिरमौर बन गया. असल में यह 2012 में भी करीब-करीब उत्तर प्रदेश के बराबर ठहरता है, जो अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों के लिए इतना बदनाम राज्य रहा है. बलात्कारों की दर के मामले में 2012 में पांच राज्य छत्तीसगढ़ (3.86), हरियाणा (2.79), केरल (6.34), मध्य प्रदेश (6.75) और राजस्थान (3.44) गुजरात से आगे रहे हैं. 2013 में गुजरात खुद को ऊपर ले गया और छत्तीसगढ़ को पीछे छोड़ते हुए पांचवें स्थान पर पहुंच गया. यह बस हरियाणा (5.45), केरल (7.36), मध्य प्रदेश (7.31) और राजस्थान (5.01) से ही पीछे था.

मोदी के घड़ियाली आंसू

कहा गया कि नरेन्द्र मोदी इस हादसे के बारे में जानकर विचलित थे, मानो उनके ‘आदर्श’ गुजरात में पहली बार दलितों पर जुल्म हो रहा हो. सितंबर 2012 में गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के एक छोटे से कस्बे थानगढ़ में मोदी की पुलिस ने लगातार दो दिनों (22 और 23 सितंबर) में तीन दलित नौजवानों को गोली मार कर हत्या कर दी, लेकिन मोदी एक शब्द भी नहीं बोले जबकि वे उस जगह से महज 17 किमी दूर विवेकानंद यूथ विकास यात्रा का नेतृत्व कर रहे थे.

पहले दिन एक छोटे से झगड़े में एक दलित नौजवान को पीटने वाले भारवाड़ों के खिलाफ विरोध कर रहे दलितों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं. पुलिस फायरिंग में एक सात साल का लड़का पंकज सुमरा गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसकी मौत बाद में राजकोट अस्पताल में हो गई. मौत की खबर ने दलितों में नाराजगी भड़का दी जो इस मौत के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की मांग के साथ सड़कों पर उतर पड़े. अगले दिन, पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों पर फिर से गोलियां चलाईं और तीन दलित नौजवानों को घायल कर दिया, जिनमें से दो मेहुल राठौड़ (17) और प्रकाश परमार (26) राजकोट सिविल अस्पताल में मर गए. 2012 के राज्य विधानसभा चुनावों के ऐन पहले हुई इन हत्याओं से राज्य भर में सदमे की लहर दौड़ गई और चार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई गईं. जांच सीआईडी (अपराध) को सौंप दी गई. लेकिन पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआरों के बावजूद सिर्फ एक मामले में ही आरोपपत्र (चार्ज शीट) दायर की गई और एक आरोपित बीसी सोलंकी को तो गिरफ्तार तक नहीं किया गया.

गुजरात में अपने दलित समुदाय के सामंती दमन का लंबा इतिहास रहा है. राज्य का दलित समुदाय राष्ट्रीय औसत 16.6 की तुलना में छोटा और आबादी का महज 7.1 फीसदी है और यह मुख्यत: राजनीतिक रूप से निष्क्रिय रहा है. हालिया इतिहास में, 1970 के दशक में दलित पैंथर्स की झलक के बाद, उन्हें 1981 के आरक्षण विरोधी दंगों ने गांधीवादी नींद से झटके से जगाया. पहली बार राज्य भर में आंबेडकर जयंतियों के उत्सव का दौर शुरू हुआ. लेकिन यह जागना बहुत थोड़ी देर का ही साबित हुआ. जब भाजपा ने दलितों की चुनावी अहमियत को महसूस किया और उन्हें लुभाना शुरू किया, वे आसानी से उनकी बातों में आ गए और 1986 में इसके जगन्नाथ रथ जुलूसों में बढ़-चढ़ कर भागीदारी करने लगे. आगे चल कर खास कर 2002 में गोधरा के बाद मुसलमानों के कत्लेआम के दौरान वे राजी-खुशी से इसके लठैत बन गए. लेकिन जमीन पर उनके लिए कुछ भी नहीं बदला. दलित-विरोधी सिविल सोसायटी की हिमायत से राज्य की खुली या छुपी मिलीभगत के साथ भेदभाव, अपमान, शोषण और अत्याचार बेलगाम तरीके से बढ़ते रहे.

हाल के ही एक अध्ययन ने दिखाया है कि गुजरात में चार जिलों में होने वाले अत्याचार के सभी मामलों में से 36.6 फीसदी को अत्याचार निवारण अधिनियम (एट्रॉसिटी एक्ट) के तहत दर्ज नहीं किया गया था और जहां इस एक्ट को लागू भी किया गया था, वहां भी 84.4 फीसदी मामलों में इसको गलत प्रावधानों के साथ दर्ज किया गया था, जिससे मामलों में हिंसा की गहनता छुप गई थी.[1] इसके पहले अहमदाबाद स्थित काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस ने 1 अप्रैल 1995 से एक दशक के भीतर इस एक्ट के तहत राज्य के 16 जिलों में स्थापित स्पेशल एट्रॉसिटी कोर्ट्स में दिए गए 400 फैसलों का अध्ययन किया और पाया कि पुलिस द्वारा नियमों के निरंकुश उल्लंघन ने मुकदमे को कमजोर किया. फिर न्यायपालिका ने अपने पूर्वाग्रहों से भी इस एक्ट को नकारा बनाने में योगदान किया.[2]

कोई हैरानी नहीं है कि गुजरात में अत्याचार के मामलों में कसूर साबित होने की दर 10 बरसों में अनुसूचित जातियों-जनजातियों के मामले में भारतीय औसत से छह गुना कम है. 2014 में (जो सबसे ताजा उपलब्ध आंकड़े हैं) अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों में से सिर्फ 3.4 फीसदी में ही आखिर में कसूर साबित हो पाया. जबकि इन्हीं अपराधों में कसूर साबित होने की राष्ट्रीय दर 28.8 फीसदी है यानी देश भर में हरेक आठ अत्याचार में एक में कसूर साबित होता है. हैरानी की बात नहीं है कि राज्य में छुआछूत का चलन धड़ल्ले से जारी है. 2007 से 2010 के दौरान गुजरात के दलितों के बीच काम करने वाले एक संगठन नवसर्जन ट्रस्ट द्वारा रॉबर्ट ई. केनेडी सेंर फॉर जस्टिस एंड ह्यूमन राइट्स के साथ मिल कर किए गए “अंडरस्टैंडिंग अनटचेबिलिटी: अ कॉम्प्रीहेन्सिव स्टडी ऑफ प्रैक्टिसेज़ एंड कन्डीशंस इन 1,589 विलेजेज़” नाम के एक अध्ययन ने ग्रामीण गुजरात में छुआछूत के चलन की व्यापक घटनाओं को उजागर किया.[3] अपने आस पास समृद्धि के समंदर में अपने अंधेरे भविष्य को देखते हुए दलितों की नई पीढ़ी इसको कबूल नहीं करेगी. यह भाजपा की मीठी-मीठी बातों के नीचे छुपाई हुई दलित-विरोधी नीतियों की वजह से जमा होता आया गुस्सा था जो राज्य में दलितों के सहज रूप से भड़क उठने की शक्ल में सामने आया.

अभागों की आह

हालिया आंदोलन दलितों के नए सिरे से उठ खड़े होने के संकेत हैं. कांग्रेस के बरअक्स भाजपा के दोमुंहेपन और निरंकुशता, आंबेडकर के लिए स्मारक बनवाने और खुद को सबसे बड़े आंबेडकर भक्त के रूप दिखाने का पाखंड एक के बाद एक इन दलित विरोधी गतिविधियों से बखूबी तार-तार हो गया है. जब अक्तूबर 2002 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के गौ रक्षा गिरोहों ने हरियाणा के झज्झर के दुलीना में पांच बेगुनाह दलित नौजवानों को पीट-पीट कर मार दिया था और फिर पुलिस की ठीक नाक के नीचे उन्हें जला दिया था तो विहिप के उपाध्यक्ष गिरिराज किशोर ने उन हत्याओं को यह कह कर जायज ठहराया था: “हमारे धार्मिक ग्रंथों (पुराणों) में गाय की जान इंसानों की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण है.” तब हरियाणा के भाजपा अध्यक्ष राम बिलास शर्मा ने गाय की हत्या को इंसान के कत्ल जितने जघन्य अपराध के रूप में लेने का वादा किया था. शायद दलितों ने उस घटना को इक्की-दुक्की घटना के रूप में लेते हुए भाजपा को माफ कर दिया था.

लेकिन इस बार एक के बाद एक जल्दी जल्दी होने वाली इन घटनाओं ने ऐसा दिखता है कि भाजपा के असली दलित-विरोधी चरित्र को उन पर उजागर कर दिया है. हालांकि इधर भाजपा ने हिंदू राष्ट्र के अपने एजेंडे को पूरा करने के लिए दलित वोटों की बड़ी अहमियत को इधर महसूस किया है, लेकिन उन दोनों के बीच के ऐतिहासिक और विचारधारात्मक विरोधाभासों को आसानी से नहीं सुलझाया जा सकता है. दलित विरोधी भावनाएं किसी न किसी स्वामी या साध्वी की शेखी के जरिए या फिर हिंदुत्व के गुंडे-मवालियों द्वारा किए गए अत्याचारों के जरिए सामने आती रहेंगी.

चाहे इसको जैसी भी शक्ल दी जाए, हिंदुत्व का मतलब हिंदू रिवाजों, प्रथाओं और संस्कृति पर गर्व करना ही है, और ये जाति व्यवस्था का ही एक दूसरा नाम हैं और इस तरह यह दलितों की मुक्ति के एजेंडे का विरोधी है. गाय के लिए हिंदुत्व की सनक ने – जो अब गाय के पूरे परिवार तक फैल गई है – अब मुसलमानों के बाद दलितों को चोट पहुंचाई है. यह उन्हें उनके पसंदीदा बीफ (गोमांस) से वंचित करती है जो प्रोटीन का बहुत सस्ता स्रोत है और इसने उनके लाखों लोगों को बेरोजगार बना दिया है. छोटे किसानों के रूप में दलित मवेशी पालते हैं. ‘गाय नीति’ उनकी माली हालत पर गंभीर चोट करती है.

सबसे हैरान करने वाली बात इसके पीछे की अतार्किकता और दोमुंहापन है. आर्थिक अतार्किकता को कई अर्थशास्त्रियों ने उजागर किया है और अगर यह बनी रही तो कुछ बरसों में यह देश के लिए अकेली सबसे बड़ी तबाही बन सकती है. और दोमुंहापन ये है कि जबकि हजारों छोटे कत्लखानों में मवेशियों के कत्ल पर पाबंदी है और जिसने लाखों मुसलमान और दलित बेरोजगार बना दिया है, निर्यात के लिए छह बड़े कत्लखाने इसी समय फल-फूल रहे हैं, जिनमें से चार के मालिक हिंदू हैं और उनमें से भी दो ब्राह्मण हैं. चाहे यह गाय के कत्ल का मामला हो या इसका सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पहलू हो, ये सीधे-सीधे दलितों के हितों और उनकी उम्मीदों का विरोधी है.

हिंदुत्व के दलित-विरोधी पंजों के साथ सामने आने के साथ ही, यह तय है कि भाजपा को अगले चुनावों में इसकी आंच को महसूस करना होगा.

नोट्स
[1] http://navsarjan.org/navsarjan/status-of-dalits-in-gujarat/

[2] https://www.sabrangindia.in/tags/council-social-justice.

[3] http://navsarjan.org/Documents/Untouchability_Report_FINAL_Complete.pdf.

गुजरात में दलितों का आंदोलन: आनंद तेलतुंबड़े

Posted by Reyaz-ul-haque on 8/07/2016 02:33:00 PM



आनंद तेलतुंबड़े
अनुवाद: रेयाज उल हक


भाजपा के आदर्श राज्य गुजरात में चार दलित युवकों को हिंदुत्व के हत्यारे गिरोह द्वारा सरेआम पीटे जाने की एक शर्मनाक घटना घटी. 11 जुलाई को गौ रक्षा समिति के नाम से शिव सेना के आदमियों का एक गिरोह एक दलित परिवार के पास आया, जो गिर सोमनाथ जिले के उना तालुके में मोटा समाधियाला गांव में एक गाय की लाश से चमड़ा उतार रहे थे. उन पर गाय की हत्या करने का आरोप लगा कर गिरोह ने पूरे परिवार को पीटा और फिर चार नौजवानों को पकड़ा. उन्होंने उन्हें कमर तक नंगा किया, एक कार के पीछे बांध कर वे उन्हें घसीटते हुए उना शहर ले आए जहां ठीक एक पुलिस थाने की बगल में सबकी आंखों के सामने उन्हें पीटा गया. हमलावरों को इस बात को लेकर यकीन था कि उन पर कभी भी कार्रवाई नहीं होगी और उन्होंने अपने इस खौफनाक कारनामे का वीडियो बनाकर उसे प्रचारित किया. लेकिन उनकी यह हरकत उल्टी पड़ी और इससे दलित भड़क उठे और सड़क पर उतर पड़े. उन्होंने विरोध प्रदर्शन की एक मिसाल कायम की. हालांकि राज्य में दलितों की स्थिति के मामले में गुजरात कभी भी एक आदर्श नहीं था, लेकिन सरेआम दलितों पर ऐसा बेधड़क अत्याचार पहले कभी नहीं देखा गया था. इसने गुजरात में दलित विरोधी तत्वों द्वारा सरकार के हिंदुत्व के एजेंडे के समर्थन की ओट में अपने पूर्वाग्रहों पर बेलगाम अमल करने की हिम्मत को ही उजागर किया है.

मोदी के घड़ियाली आंसू

कहा गया कि नरेन्द्र मोदी इस हादसे के बारे में जानकर विचलित थे, मानो वे गुजरात में दलितों पर होने वाले जुल्म को कभी जानते ही न हों. उन्हें बेहतर मालूम होगा कि दलितों पर होने वाले अत्याचारों की दरों के मामले में गुजरात को सबसे ऊपर के पांच राज्यों में लगातार बने रहने का मनहूस सम्मान हासिल है. 2013 में जब आने वाले आम चुनावों और उनके प्रधान मंत्री के उम्मीदवार बनने के दौर में वाइब्रेंट गुजरात का उनका प्रचार शिखर पर पहुंचा, अनुसूचित जातियों की प्रति लाख आबादी पर अत्याचारों की संख्या 29.21 थी जो पिछले साल के आंकड़े 25.23 से बढ़ गया था, और गुजरात चौथा सबसे बदतर राज्य बन गया था. राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो (एनसीआरबी) ने इसके पहले के बरसों में प्रति लाख आबादी पर अत्याचारों की घटनाओं का गलत इस्तेमाल किया था और इसे सिर्फ 2012 में ही सुधारा गया. इसलिए एनसीआरबी की तालिकाओं में दिए गए अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों की घटनाओं की दरों को सुधार कर पूरे आंकड़े बनाना जरूरी होगा, लेकिन इससे राज्यों के बीच में गुजरात की तुलनात्मक स्थिति सुधर जाएगी, इसकी गुंजाइश कम ही है. हत्याओं और बलात्कारों जैसे बड़े अत्याचारों के वर्ग में भी गुजरात ने बाकी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है. तालिका एक में भारत के मुख्य राज्यों के लिए 2012 और 2013 के लिए इन अत्याचारों की दरें दी गई हैं, ताकि यह दिखाया जा सके कि कैसे गुजरात दलितों के खिलाफ अपराधों के मामले में सबसे ऊपर के कुछ राज्यों में जगह बनाता है.



तालिका साफ-साफ दिखाती है कि हत्याओं की दरों के मामले में 2012 में सिर्फ दो ही राज्य, उत्तर प्रदेश (0.57) और मध्य प्रदेश (0.78) गुजरात से आगे थे और 2013 में गुजरात साफ तौर पर उनका सिरमौर बन गया. असल में यह 2012 में भी करीब-करीब उत्तर प्रदेश के बराबर ठहरता है, जो अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों के लिए इतना बदनाम राज्य रहा है. बलात्कारों की दर के मामले में 2012 में पांच राज्य छत्तीसगढ़ (3.86), हरियाणा (2.79), केरल (6.34), मध्य प्रदेश (6.75) और राजस्थान (3.44) गुजरात से आगे रहे हैं. 2013 में गुजरात खुद को ऊपर ले गया और छत्तीसगढ़ को पीछे छोड़ते हुए पांचवें स्थान पर पहुंच गया. यह बस हरियाणा (5.45), केरल (7.36), मध्य प्रदेश (7.31) और राजस्थान (5.01) से ही पीछे था.

सितंबर 2012 में गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के एक छोटे से कस्बे थानगढ़ में मोदी की पुलिस ने लगातार दो दिनों (22 और 23 सितंबर) में तीन दलित नौजवानों को गोली मार कर हत्या कर दी, लेकिन मोदी एक शब्द भी नहीं बोले जबकि वे उस जगह से महज 17 किमी दूर विवेकानंद यूथ विकास यात्रा का नेतृत्व कर रहे थे. पहले दिन एक छोटे से झगड़े में एक दलित नौजवान को पीटने वाले भारवाड़ों के खिलाफ विरोध कर रहे दलितों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं. पुलिस फायरिंग में एक सात साल का लड़का पंकज सुमरा गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसकी मौत बाद में राजकोट अस्पताल में हो गई. मौत की खबर ने दलितों में नाराजगी भड़का दी जो इस मौत के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की मांग के साथ सड़कों पर उतर पड़े. अगले दिन, पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों पर फिर से गोलियां चलाईं और तीन दलित नौजवानों को घायल कर दिया, जिनमें से दो मेहुल राठौड़ (17) और प्रकाश परमार (26) राजकोट सिविल अस्पताल में मर गए. 2012 के राज्य विधानसभा चुनावों के ऐन पहले हुई इन हत्याओं से राज्य भर में सदमे की लहर दौड़ गई और चार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई गईं. जांच सीआईडी (अपराध) को सौंप दी गई. लेकिन पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआरों के बावजूद सिर्फ एक मामले में ही आरोपपत्र (चार्ज शीट) दायर की गई और एक आरोपित बीसी सोलंकी को तो गिरफ्तार तक नहीं किया गया.

जमा हुआ गुस्सा

गुजरात में अपने दलित समुदाय के सामंती दमन का लंबा इतिहास रहा है. राज्य का दलित समुदाय राष्ट्रीय औसत 16.6 की तुलना में छोटा और आबादी का महज 7.1 फीसदी है और यह मुख्यत: राजनीतिक रूप से निष्क्रिय रहा है. हालिया इतिहास में, 1970 के दशक में दलित पैंथर्स की झलक के बाद, उन्हें 1981 के आरक्षण विरोधी दंगों ने गांधीवादी नींद से झटके से जगाया. पहली बार राज्य भर में आंबेडकर जयंतियों के उत्सव का दौर शुरू हुआ. लेकिन यह जागना बहुत थोड़ी देर का ही साबित हुआ. जब भाजपा ने दलितों की चुनावी अहमियत को महसूस किया और उन्हें लुभाना शुरू किया, वे आसानी से उनकी बातों में आ गए और 1986 में इसके जगन्नाथ रथ जुलूसों में बढ़-चढ़ कर भागीदारी करने लगे और आगे चल कर उन्होंने खास कर 2002 में गोधरा के बाद मुसलमानों के कत्लेआम के दौरान इसका कारिंदा बनना कबूल कर लिया. लेकिन जमीन पर उनके लिए कुछ भी नहीं बदला. दलित-विरोधी सिविल सोसायटी की हिमायत से राज्य की खुली या छुपी मिलीभगत के साथ भेदभाव, अपमान, शोषण और अत्याचार बेलगाम तरीके से बढ़ते रहे.

हाल के ही एक अध्ययन ने दिखाया है कि गुजरात में चार जिलों में होने वाले अत्याचार के सभी मामलों में से 36.6 फीसदी को अत्याचार निवारण अधिनियम (एट्रॉसिटी एक्ट) के तहत दर्ज नहीं किया गया था और जहां इस एक्ट को लागू भी किया गया था, वहां भी 84.4 फीसदी मामलों में इसको गलत प्रावधानों के साथ दर्ज किया गया था, जिससे मामलों में हिंसा की गहनता छुप गई थी.[1]  इसके पहले अहमदाबाद स्थित काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस ने 1 अप्रैल 1995 से एक दशक के भीतर इस एक्ट के तहत राज्य के 16 जिलों में स्थापित स्पेशल एट्रॉसिटी कोर्ट्स में दिए गए 400 फैसलों का अध्ययन किया और पाया कि पुलिस द्वारा नियमों के निरंकुश उल्लंघन ने मुकदमे को कमजोर किया. फिर न्यायपालिका ने अपने पूर्वाग्रहों से भी इस एक्ट को नकारा बनाने में योगदान किया.[2]  कोई हैरानी नहीं है कि गुजरात में अत्याचार के मामलों में कसूर साबित होने की दर 10 बरसों में अनुसूचित जातियों-जनजातियों के मामले में भारतीय औसत से छह गुना कम है. 2014 में (जो सबसे ताजा उपलब्ध आंकड़े हैं) अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों में से सिर्फ 3.4 फीसदी में ही आखिर में कसूर साबित हो पाया. जबकि इन्हीं अपराधों में कसूर साबित होने की राष्ट्रीय दर 28.8 फीसदी है यानी देश भर में हरेक आठ अत्याचार में एक में कसूर साबित होता है. हैरानी की बात नहीं है कि राज्य में छुआछूत का चलन धड़ल्ले से जारी है. 2007 से 2010 के दौरान गुजरात के दलितों के बीच काम करने वाले एक संगठन नवसर्जन ट्रस्ट द्वारा रॉबर्ट ई. केनेडी सेंर फॉर जस्टिस एंड ह्यूमन राइट्स के साथ मिल कर किए गए “अंडरस्टैंडिंग अनटचेबिलिटी: अ कॉम्प्रीहेन्सिव स्टडी ऑफ प्रैक्टिसेज़ एंड कन्डीशंस इन 1,589 विलेजेज़” नाम के एक अध्ययन ने ग्रामीण गुजरात में छुआछूत के चलन की व्यापक घटनाओं को उजागर किया.[3]  अपने आस पास समृद्धि के समंदर में अपने अंधेरे भविष्य को देखते हुए दलितों की नई पीढ़ी इसको कबूल नहीं करेगी. यह भाजपा की मीठी-मीठी बातों के नीचे छुपाई हुई दलित-विरोधी नीतियों की वजह से जमा होता आया गुस्सा था जो राज्य में दलितों के सहज रूप से भड़क उठने की शक्ल में सामने आया.

भाजपा की हत्यारी गाय

इस अत्याचार और उसके बाद के गुस्से की जड़ में स्वयंभू गिरोहों का यह शक था कि गाय की हत्या की गई थी. इन गिरोहों को सत्ताधारी भाजपा के हालिया उकसावों से सीधी ताकत मिलती है. इस घटना ने हरियाणा के झज्झर की घटना की याद दिला दी जहां 15 अक्तूबर 2002 को पांच दलितों की गाय की हत्या के ऐसे ही शक में दुलीना में पुलिस थाने के सामने हिंदुत्व भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या कर दी गई और फिर उन्हें जला दिया गया. पीटे जाने के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए पुलिस ने पीड़ितों के ही खिलाफ प्रिवेन्शन ऑफ काऊ स्लॉटर एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया! केस तभी वापस हुआ जब पोस्ट मार्टम ने यह उजागर किया कि गाय पीटे जाने की घटना से 24 घंटे पहले मर चुकी थी. सिर्फ तब जाकर हिचकते हुए 32 गांववालों के ऊपर हत्या और हत्या की कोशिश के दो मामले दर्ज किए गए. गिरफ्तारी के फौरन बाद जनवरी में उन सभी को जमानत मिल गई जबकि उन पर कठोर धाराओं के तहत आरोप लगे थे: हत्या, जानलेवा हथियार के साथ दंगा करने, आग और विस्फोटक पदार्थों के जरिए नुकसान पहुंचाने के लिए (435) और एसी और एसटी एक्ट के तहत. बाहर आने के बाद उन्होंने सरेआम बढ़-चढ़ कर कहा कि वे फिर से ऐसा करने से नहीं हिचकेंगे. हिंदुत्व संगठनों ने इसे सार्वजनिक रूप से जायज ठहराया. 28 सितंबर 2015 को ऐसी ही एक हत्यारी भीड़ ने इस अफवाह के बाद उत्तर प्रदेश में दादरी के करीब बिसाहड़ा गांव में एक मुसलमान परिवार पर हमला किया कि उन्होंने गोमांस रखा हुआ है और उसे खा रहे हैं. उन्होंने 50 साल के मुहम्मद अखलाक पीट-पीट कर मार डाला और उनके बेटे दानिश को गंभीर रूप से जख्मी कर दिया. हत्यारों को तो कुछ नहीं हुआ है लेकिन सूरजपुर में स्थानीय अदालत के निर्देश पर पुलिस द्वारा मुहम्मद अखलाक के परिवार के खिलाफ गाय की हत्या करने का एक केस दर्ज कर लिया गया है!

सरकार ने बेशर्मी से संविधान के भाग चार में दिए गए राज्य के नीति निर्देशक तत्वों की अनदेखी जारी रखी है, जो शासन के बुनियादी उसूल होने चाहिए थे. लेकिन यही सरकार जनता और अर्थव्यवस्था की व्यापक बहुसंख्या के लिए नुकसानदेह होने की वजह से गाय के पूरे परिवार (गोवंश) की हत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले एक अनुच्छेद की ओट लेती है. आनेवाले बरसों में यह सनक पक्के तौर पर देश के लिए अकेली सबसे बड़ी तबाही बनने जा रही है, लेकिन अभी तो यह मुसलमानों और दलितों की जान लेने वाली हत्यारा बन गई है, जो कारोबारी तौर पर गाय के परिवार की हत्या से जुड़े हैं और उस पर निर्भर हैं.

भाजपा इसके नतीजों की अनदेखी कर सकती है, लेकिन ऐसा करके वह खुद को तबाही के रास्ते पर ही ले जाएगी.

नोट्स

[1] http://navsarjan.org/navsarjan/status-of-dalits-in-gujarat/
[2] https://www.sabrangindia.in/tags/council-social-justice.
[3] http://navsarjan.org/Documents/Untouchability_Report_FINAL_Complete.pdf.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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