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बीच सफ़हे की लड़ाई

वोट डालें, या राजनीति को फिर से गढ़ें?: आलें बादिऊ

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/09/2017 12:32:00 PM


दुनिया के जाने माने दार्शनिक, राजनीति और गणित के जानकार, उपन्यासकार और नाटककार आलें बादिऊ ने हाल में हुए फ्रांसीसी चुनावों के दौरान कुछ महत्वपूर्ण लेख लिखे हैं, जिनमें उन्होंने फ्रांस के खास राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों, पार्टियों और धाराओं पर बहस करते हुए मौजूदा दौर में पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी रुझानों पर गौर किया है और ऐसे माहौल से आगे जाने और इंसानियत की मुक्ति के सवाल पर आगे की राह तलाशने की जरूरत पर जोर दिया है. इन लेखों में से हम दो लेखों को यहां पेश कर रहे हैं, जिनमें से मुख्यत: फ्रांस के स्थानीय चुनावी संदर्भ वाले अंशों को हटा दिया गया है. यहां पर दो भागों में पेश किए जा रहे इन लेखों के मूल फ्रांसीसी से अंग्रेजी अनुवाद क्रमश: “वोट, ऑर री-इन्वेंट पॉलिटिक्स” और “लेट्स लूज़ इंटरेस्ट इन इलेक्शंस, वंस एंड फॉर ऑल!” शीर्षक से वर्सो बुक्स के ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है. ये लेख भारत सहित दुनिया भर में मौजूदा राजनीतिक हालात की एक बेहतर समझ बनाने की दिशा में उपयोगी हैं, इस यकीन के साथ इन्हें यहां पेश किया जा रहा है. अनुवाद एवं प्रस्तुति: रेयाज उल हक

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पुरानी और जानी-मानी भूमिकाओं के इस रंगमंच में, राजनीतिक प्रतिबद्धता का बहुत थोड़ा सा ही मोल है, या फिर यह सियासी करतब के लिए एक बहाना भर है. इसलिए बेहतर होगा कि हम इस सवाल से शुरू करें: राजनीति क्या है? और एक पहचानी जा सकने वाली, घोषित राजनीति क्या है?

चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए

कोई राजनीति हमेशा तीन तत्वों के आधार पर खुद को परिभाषित कर सकती है. इनमें से पहला तत्व है सामान्य जनता का समूह और साथ ही उसके काम और उसकी सोच. आइए, हम इसे “जनता” कहें. इसके बाद विभिन्न सामूहिक संगठन आते हैं: असोसिएशन, यूनियन, पार्टियां – कुल मिला कर वे सभी समूह जो सामूहिक कार्रवाई करने के काबिल होते हैं. आखिर में राजसत्ता के अंग – सांसद, सरकार, सेना, पुलिस – आते हैं लेकिन साथ ही आर्थिक और/या मीडिया सत्ता के हिस्से भी इसके भीतर आते हैं (यह एक ऐसा फर्क है जो अब करीब करीब ऊपर से दिखाई नहीं देता), या फिर हर वो चीज जिसे आज हम एक खूबसूरत लगने वाले और लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाने तरीके से “फैसला लेने वाले लोग” कहा करते हैं.

राजनीति, हमेशा ही इन तीन तत्वों के जरिए मकसद को हासिल करने से बनती है. इस तरह हम देख सकते हैं कि आधुनिक दुनिया में मोटे तौर पर चार बुनियादी राजनीतिक नजरिए पाए जाते हैं: फासीवादी, रूढ़िवादी, सुधारवादी और कम्युनिज्म (साम्यवादी).

रूढ़िवादी और सुधारवादी नजरिए विकसित पूंजीवादी समाजों का मध्यमार्गी संसदीय धड़ा (ब्लॉक) बनाते हैं: फ्रांस में वामपंथ और दक्षिणपंथ, संयुक्त राज्य अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट वगैरह. इन दोनों नजरियों में बुनियादी तौर पर जो बात आपस में मिलती है वह ये है कि ये दोनों ही दावा करते हैं कि उनके बीच एक टकराव मौजूद है – खास तौर से इन तीनों तत्वों की अभिव्यक्ति के अर्थ में – इसके बावजूद इनमें से दोनों ही नजरिए संवैधानिक सीमाओं के भीतर रह सकते हैं और निश्चित रूप से रहते हैं.

इनसे अलग बचे दूसरे दोनों नजरियों, फासीवाद और कम्युनिज्म में, मकसद को लेकर अपने बीच के हिंसक विरोध के बावजूद जो बात एक जैसी है वो यह है कि दोनों ही मानते हैं कि राजसत्ता के सवाल पर विभिन्न पार्टियों के बीच के टकराव में, सुलह-समझौता नामुमकिन है: इसको किसी संवैधानिक सर्वसहमति का पाबंद नहीं बनाया जा सकता है. ये नजरिए अपने से विरोधी या यहां तक कि अपने से अलग किसी भी मकसद को समाज और राज्य की अपनी अवधारणाओं में शामिल करने से इन्कार करते हैं.

चहेता फासीवाद-परस्त नजरिया

हम राजसत्ता के उस संगठन के लिए “संसदीयतावाद” के नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं जो चुनावी मशीनरी, अपने दलों और उनके अनुयायियों के जरिए रूढ़िवादियों और सुधारवादियों के साझे वर्चस्व को सुनिश्चित करता है. यह वर्चस्व हर जगह राज सत्ता पर फासीवादियों या कम्युनिस्टों के दखल की किसी भी गंभीर संभावना को खत्म करता है. हम जिसे “पश्चिम” कहते हैं, वहां पर यही राज्य का प्रभुत्वशाली रूप है. खुद इसके लिए एक तीसरे नाम की जरूरत है, जो इन दोनों मुख्य नजरियों के बीच आपस में तालमेल का एक साझा और ताकतवर आधार हो और जो इन दोनों का अटूट अंग हो और इनके अलावा भी जिसका वजूद हो. यह साफ है कि हमारे समाजों में नवउदारवादी पूंजीवाद यही आधार है. कारोबार और निजी दौलत को बढ़ाते जाने की बेपनाह आजादी, निजी संपत्ति के लिए पूरा सम्मान (अदालती व्यवस्था और भारी पुलिस बंदोबस्त जिसकी गारंटी करती है), बैंकों में भरोसा, युवाओं की शिक्षा, “लोकतंत्र” की ओट में होड़ (प्रतिस्पर्धा), “कामयाबी” की भूख,  बराबरी के नुकसानदेह और काल्पनिक चरित्र का बार-बार दावा करना: यह आम राय से कबूल की गई “आजादियों” का एक सांचा (मैट्रिक्स) है. ये वो आजादियां हैं जिनकी हमेशा गारंटी करने के लिए दोनों तथाकथित “शासनकारी” पार्टियां कमोबेश प्रतिबद्ध हैं.

पूंजीवाद का होना, संसदीय सर्वसहमति के मूल्य में कुछ अनिश्चितताएं लेकर आता है, और इस तरह चुनावी रस्मों के दौरान “बड़े” रूढ़िवादी या सुधारवादी पार्टियों में भरोसे को जाहिर किया जाता है. यह खास तौर से निम्न बुर्जुआ के लिए सही है, जिसकी सामाजिक हैसियत खतरे में होती है, या फिर मेहनतकश वर्ग के लिए, जो उद्योगों के धीरे-धीरे बंद होने से तबाह हो गए हैं. पश्चिम में हम यही देख रहे हैं, जहां एशियाई देशों की उभरती हुई ताकत के मुकाबले, हम एक तरह का पतन देख सकते हैं. आज का यह खास संकट साफ तौर पर फासीवादी, राष्ट्रवादी, धार्मिक, इस्लामविरोधी और युद्ध को पसंद करने वाले नजरिए का समर्थन करता है, क्योंकि खौफ एक बहुत बुरा सलाहकार है और संकट में डूबे ये खास समाज पहचान पर आधारित मिथकों की गिरफ्त में जाने को बेकरार हैं. सबसे बढ़कर इसलिए कि कम्युनिस्ट परिकल्पना मुख्यत: सोवियत संघ और चीन के जनवादी गणतंत्र के अपने पहले और राज्य आधारित संस्करणों की ऐतिहासिक नाकामियों की वजह बहुत बुरी तरह कमजोर होकर सामने आई है.

इस नाकामी के नतीजे खुद ब खुद जाहिर हैं: नौजवानों, वंचितों और बदहाल लोगों, रोजगार से बेदखल मजदूरों और हमारे उपनगरों के घुमंतू सर्वहारा इस बात पर यकीन करने लगे हैं कि कड़वाहट भरी पहचानों (अस्मिताओं), नस्लवाद और राष्ट्रवाद की फासीवादी राजनीति ही हमारी संसदीय सर्वसहमति का अकेला विकल्प है.

कम्युनिज्म, इंसानियत की मुक्ति

हालात ने जो रुख लिया है, अगर हम उसके खिलाफ हैं तो हमारे सामने सिर्फ एक ही रास्ता है: हमें कम्युनिज्म को फिर से गढ़ना होगा, उसमें जरूरी बदलाव करके उसे फिर से पेश करना होगा. अब यह जरूरी हो गया है कि बहुत अपमानित हो चुके इस शब्द को हम फिर से उठाएं, इसे साफ करें और फिर से इसकी रचना करें. यह इंसानियत की मुक्ति का हरकारा है, करीब दो सदियों से इसकी यही भूमिका रही है और ऐसा करते हुए इस महान नजरिए को हकीकत का समर्थन हासिल होता रहा है. अभूतपूर्व कोशिशों के कुछ दशक (जो इसलिए हिंसक थे कि इस दौरान बेरहमी से इसकी घेरेबंदी करके इस पर हमला किया गया जिसकी वजह से यह हार जाने के लिए अभिशप्त था) मजबूत इरादों वाले लोगों को इस बात का कायल नहीं बना सकते कि इस संभावना को हमेशा के लिए दफ्न कर दिया जाना चाहिए. वे हमें इसके लिए मजबूर भी नहीं कर सकते कि हम इसको जमीन पर उतार लाने की जिम्मेदारियों को हमेशा के लिए छोड़ दें.

इसलिए, क्या तब हमें वोट डालना चाहिए? बुनियादी तौर पर राज्य और इसके संगठनों की ओर से आने वाली इस मांग से हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. अब तक हमें यह मालूम हो जाना चाहिए कि वोट डालने का मतलब और कुछ नहीं बल्कि मौजूदा व्यवस्था के रूढ़िवादी नजरियों में से किसी एक को मजबूत करना है.

अगर हम इसके असली मतलब तक जाएं तो वोट जनता को राजनीति से दूर करने यानी उनको अराजनीतिक बनाने का एक उत्सव है. हमें जरूरी तौर पर शुरुआत यह करनी है कि हम हर जगह पर भविष्य के लिए कम्युनिस्ट नजरिए को फिर से बाकायदा स्थापित करें. इस पर पक्के तौर पर यकीन रखने वाले जुझारू लोगों को जरूरी तौर पर दुनिया भर के लोकप्रिय संदर्भों यानी हालात में, जगह-जगह पर जाकर इसके उसूलों की चर्चा करनी होगी. जैसा कि माओ ने कहा था, हमें जरूरी तौर पर “उलझन और भ्रम के बीच से जो कुछ भी हासिल है, उसे उसकी खासियत के साथ, जनता को समझाना होगा.” और राजनीति को फिर से गढ़ने का मतलब यही तो है.


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मैं खास कर मेलेनकोनिज्म से नाउम्मीद हो चुके लोगों की कड़वाहट को समझता हूं, जो चुनावों के पहले दौर के बाद अपने गुस्से और नाराजगी को जाहिर कर रहे हैं. इसके बावजूद, वे चाहे जो भी करें या कहें, इस चुनाव में कोई खास गैरमामूली बात या धांधली नहीं हुई थी.

हालांकि असल में पार्टियों में दो अंतर्विरोध रहे हैं, जिन्होंने अफसोसनाक रूप से (वास्तव में मौजूद शक्तियों के लिए) केंद्रीय संसदीय धड़े को बिखेर दिया. यह धड़ा परंपरागत वाम और दक्षिण से मिल कर बना था. चालीस बरसों से – बल्कि दो सदियों से – यह धड़ा स्थानीय पूंजीवाद के फलने-फूलने की हिमायत करता आ रहा है. इसके बावजूद तथाकथित वामपंथ के स्थानीय प्रतिनिधि ओलां फिर से खड़े नहीं हुए, और इससे उनकी पार्टी की कमर टूट गई. दूसरी तरफ परंपरागत दक्षिणपंथ है. चुनावों की अपनी बदनसीब प्रक्रिया (प्राइमरी) की बदौलत यह अपने बेहतरीन बूढ़े घोड़े आलें युप्पे को उम्मीदवार नहीं बना पाया, बल्कि इसकी मनहूस चेहरे वाली, मुफस्सिल की एक बुर्जुआ उम्मीदवार के बतौर चुनी गई, जो आधुनिक पूंजीवाद की “सामाजिक” पसंद से कोसों दूर है.

“सामान्य” दूसरा दौर (राउंड) ओलां बनाम युप्पे का रहा होता, या फिर सबसे खराब हालात में भी मुकाबला ले पां बनाम युप्पे का रहा होता, और इन दोनों ही हालात में युप्पे आसानी से जीत जाते. सरकार की दो जर्जर पार्टियों की गैरमौजूदगी में, दो सदियों से हमारे असली मालिक यानी पूंजी के मालिक और उसके प्रबंधकों को थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी. किस्मत से (यानी अपनी किस्मत से), अपने हमेशा के राजनीतिक किरदारों के साथ मिलकर, प्रतिक्रियावाद के पुराने दिग्गजों और सामाजिक लोकतंत्र के बचे-खुचे तत्वों (वॉल, ले द्रिएं, सेगोलें रॉयल एंड कंपनी) की मदद से, उन्होंने दम तोड़ रहे लावारिस केंद्रीय संसदीय धड़े की जगह लेने के लिए एक लायक चेहरा जुटा लिया. और वह चेहरा थे: इमानुएल मैक्रों. बहुत उपयोगी तरीके से और भविष्य को देखते हुए बहुत अहम तरीके से उन्होंने अपने मकसद के लिए फ्रांसुआ बेरो को भी इसमें लगा दिया, जो एक पुराने अनुभवी मध्यमार्गी संत हैं और सभी चुनावी जंगों और सबसे मुश्किल जंगों को भी देख चुके हैं. यह सारा कुछ बड़ी ठाठ-बाट के साथ अंजाम दिया गया और इतनी फुर्ती से किया गया कि यह एक रेकॉर्ड ही है. इसके नतीजे में अंतिम कामयाबी की तो खास गारंटी थी.

इन हालात में, जिनको समझाना पूरी तरह से मुमकिन है, वोट ने पहले की तुलना में कहीं अधिक साफ तौर पर इसकी तस्दीक कर दी है कि एक पूंजीवाद परस्त और दक्षिणपंथी नजरिया (जिसमें फासीवादी रूप भी शामिल है) इस मुल्क में चरम बहुमत में है.

बुद्धिजीवियों और नौजवानों का एक हिस्सा इसे देखने से इन्कार कर रहा है या फिर इस पर कड़वाहट भरे तरीके से अफसोस जाहिर कर रहा है. लेकिन यह क्या है? क्या लोकतांत्रिक चुनावों के ये आशिक लोग ये चाहते हैं कि कोई आए और इसे बदल दे कि लोग किसको वोट करें, जैसे कि आप अपनी गंदी कमीज बदलते हैं? जो लोग वोट डालते हैं, उन्हें हर हालत में बहुमत की मर्जी को कबूल करना होता है. सचमुच, नौजवानों और बुद्धिजीवियों के ये दो उक्त समूह दुनिया को अपने हालात और अपने सपनों के पैमाने से ही मापते हैं, और किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते जहां पहुंचना जरूरी है: वह नतीजा यह है कि “लोकतांत्रिक” शब्द से उम्मीद करने लायक कुछ भी नहीं है.

1850 में नेपोलियन तृतीय ने यह देख लिया था कि वोट डालने का आम अधिकार (सार्वभौम मताधिकार) कोई खौफनाक चीज नहीं थी, जैसा कि रूढ़िवादी बुर्जुआ ने इसके बारे में कल्पना की थी, बल्कि यह एक सचमुच का वरदान था जो प्रतिक्रियावादी ताकतों के लिए एक अभूतपूर्व और अनमोल वैधता मुहैया कराता था. यह बात आज भी पूरी दुनिया में हर जगह सही है. नेपोलियन के वारिसों ने यह समझ लिया है कि कमोबेश सामान्य और स्थिर ऐतिहासिक हालात में, आबादी की बहुसंख्या हमेशा बुनियादी तौर पर रूढ़िवादी होती है.

इसलिए आइए, शांत दिमाग से एक नतीजे पर पहुंचने की कोशिश करते हैं. उन्माद में भर कर चुनावी नतीजों का मतलब लगाना और कुछ नहीं बल्कि एक बेकार की हताशा है. आइए, इसकी आदत डाल लें: अगर चार कारकों को ऐतिहासिक रूप से एक साथ नहीं लाया गया तो हमारी मौजूदा गुलामी की हालत पर कभी भी जानलेवा चोट नहीं पहुंचाई जा सकती है. और ये बातें चुनावी रस्मों से उतनी ही दूर हैं, जितनी दूर उनसे कोई चीज हो सकती है.

  1. ऐतिहासिक अस्थिरता की स्थिति, जो रूढ़िवादी जनमत पर हावी होकर उसे काबू में कर लेती है. अफसोस की बात ये है कि यह स्थिति संभावित रूप से ठीक ठीक एक युद्ध भी हो सकती है, जैसा कि 1870 में पेरिस कम्यून, 1917 में रूसी क्रांति या फिर 1937 और 1947 के बीच चीनी क्रांति के समय था.

  2. एक मजबूती से कायम किया गया विचारधारात्मक बंटवारा – विचारधारा के स्तर पर हमें यह बंटवारा करना है कि रास्ता सिर्फ एक नहीं है, बल्कि हमारे सामने दो रास्ते हैं. स्वाभाविक रूप से इसे सबसे पहले बुद्धिजीवियों के बीच अंजाम देना होगा लेकिन अंतिम तौर पर इसे खुद व्यापक जनता में स्थापित करना होगा. हमें राजनीतिक सोच के पूरे मुकाम को इस तरह खड़ा करने की जरूरत है कि हर चीज पूंजीवाद और कम्युनिज्म के बीच दुश्मनी भरे विरोध के इर्द-गिर्द स्थापित हो. इसमें इस विरोध के दूसरे आयामों की मदद भी ली जा सकती है. सरसरी तौर पर अपने पाठकों को मैं इस दूसरे रास्ते यानी कम्युनिज्म के उसूलों की याद दिलाना चाहता हूं: उत्पादन के साधनों, कर्ज और लेन-देन और निजी संपत्ति के खिलाफ प्रबंधन के सामूहिक स्वरूपों की स्थापना, श्रम को एक ही साथ अनेक रूपों में जाहिर होने को मुमकिन बनाना जिसे खास तौर से शारीरिक और बौद्धिक श्रम के रूपों के बीच फर्क ने अभी कुचल रखा है, हमेशा अंतरराष्ट्रीयतावाद पर अमल करना, और लोकप्रिय शासन के स्वरूपों पर काम करना, जो अलग-थलग राज्यों की किसी भी व्यवस्था के खात्मे के लिए काम करें.

  3. एक लोकप्रिय उभार – हमेशा की तरह यह पक्के तौर पर आबादी के एक छोटे से हिस्से का उभार होगा, लेकिन जो कम से कम राजसत्ता को स्थगित कर देगा. ऐसा एक उभार ऊपर दिए गए पहले बिंदु से जुड़ा हुआ है.

  4. एक मजबूत संगठन जो पहले तीनों बिंदुओं के बीच एक सक्रिय तालमेल को पेश करे, अपने दुश्मनों के बिखराव की दिशा में काम करे, जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी दूसरे बिंदु यानी कम्युनिस्ट रास्ते के ऊपर दिए गए उसूलों को अमल में लाने के लिए काम करे.

इन चार बिंदुओं में से दो – पहले और तीसरे – एक खास हालात के बनने पर निर्भर हैं. लेकिन दूसरे बिंदु पर तो हम अभी से ही सक्रिय रूप से काम शुरू कर सकते हैं. और यही सबसे नाजुक पहल है. हम खास कर दूसरे बिंदु की रोशनी में बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के तीनों रूपों की साझी बैठकों और कार्रवाइयों का समर्थन करते हुए चौथे बिंदु पर भी काम कर सकते हैं. बुद्धिजीवियों और सर्वहारा के जिन तीन रूपों के बीच काम किया जाना जरूरी है, वो हैं: सक्रिय मजदूर और निचले दर्जे के सरकारी कर्मचारी; पिछले तीन दशकों में उद्योगों की अंधाधुंध कमी का सबसे बुरा असर झेल रहे और नैतिक रूप से टूट चुके मजदूर परिवार; और अफ्रीका, मध्य-पूर्वी और एशियाई मूल के घुमंतू सर्वहारा.

चुनावी नतीजों के बारे में जज्बाती होते हुए अवसाद में डूब जाना या शोर मचाना न सिर्फ बेकार है बल्कि नुकसानदेह भी है. यह एक दुश्मन इलाके में जाकर मोर्चा लेने जैसी बात है, जिसका कोई फायदा नहीं है और न ही जिससे कोई हल निकलने वाला है. हमें जरूरी तौर पर चुनावों से बेपरवाह होना होगा, जो अधिक से अधिक, शुद्ध रूप से एक रणनीतिक चुनाव होते हैं कि इस “लोकतांत्रिक” किस्से में हिस्सा लेने से बचा जाए, या फिर अपने माफिक एक खास हालात पैदा करने के नजरिए से इस या उस उम्मीदवाद का समर्थन किया जाए. ये खास हालात भी हम कम्युनिस्ट राजनीति के ढांचे के भीतर सटीक रूप से परिभाषित करते हैं, जिसका इस राजसत्ता की रस्मों से कोई रिश्ता नहीं होता. हमें अपना कीमती समय अपनी सच्ची राजनीतिक मेहनत में लगाना चाहिए. और यह काम ऊपर दिए गए चार बिंदुओं के दायरे में ही होना चाहिए.


समयांतर, जून 2017 में प्रकाशित

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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